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ISSN 2292-9754

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12.31.2015


जब हमें ख़ुद नहीं है ख़ुद ही का पता

जब हमें ख़ुद नहीं है ख़ुद ही का पता
किससे पूछें भला ज़िन्दगी का पता

जो ख़ुदा को ख़ुदा मानते ही नहीं
वो बताएँगे क्या बन्दगी का पता

आज फ़ैशन परस्ती के इस दौर में
गुम हुआ दोस्तो सादगी का पता

कली का कलेजा है जाता दहल
याद आता है जब दरिंदगी का पता

पूरी अंधों की वीरान बस्ती है ये
कौन देगा मुझे रोशनी का पता

पैर ‘अनिरुद्ध’ के अब ठहरते नहीं
मिला है जब से आवारगी का पता


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