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ISSN 2292-9754

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01.14.2016


दिल मिरा ये सोचकर हैरान है

दिल मिरा ये सोचकर हैरान है
आदमी क्यों हो गया हैवान है

हम करें किस पर भरोसा आजकल
हर जगह काबिज़ यहाँ शैतान है

प्यार के गुंचे नहीं खिलते हैं अब
नफ़रतों से गुलसितां वीरान है

हाले-दिल पूछा जो मेरा आपने
आपका मुझपर बड़ा अहसान है

उस चमन में आ नहीं सकती बहार
जिस पे माली का नहीं कुछ ध्यान है

छोड़ दूँ कैसे मैं करना शाइरी
शाइरी ‘अनिरुद्ध’ की तो जान है


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