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ISSN 2292-9754

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05.04.2016


जो ख़ुद टूटते हैं

जो ख़ुद टूटते हैं, नहीं तोड़ते हैं,
वो टूटे हुए दिलों को जोड़ते हैं ।

जो चलना न था दो क़दम साथ मेरे,
मुहब्बत की बातें वो क्यों बोलते हैं।

ये जीवन के रस्ते नहीं एक मण्डी,
तो रिश्तों को स्वार्थों में क्यों तौलते हैं।

भुला कर भी भूले नहीं याद तेरी,
क्या वो भी हमारे लिये सोचते हैं।

जहाँ से चले थे, वहीं लौट आए,
मंज़िल पे पहुँच हमको क्यों मोड़ते हैं।


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