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ISSN 2292-9754

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02.04.2018


हँसी

“तुझे पता है ना, मुझे ऐसी सब्ज़ी पसंद नहीं। इतना कम तेल, ना हल्दी पता लगती है ना ही नमक।” कटोरी दूर जा गिरती है, साथ ही थप्पड़ से मंशा के कान गूँज उठते हैं, ऐसा नहीं था यह सब पहली बार हो फिर भी हर बार आँसू ज़्यादा ही निकलते। दिलीप ने खाना नहीं खाया तो मंशा भी रात का व्रत पूरा किये सो गई। पति का ग़ुस्सा उतारने के लिए वह दिलीप की पसंद का खाना बनाया करती। फिर भी हर बात पे मंशा को दिलीप द्वारा घूरा जाना, हर काम के लिए टोका जाना उसके दिल में दहशत पैदा कर चुका था। सामान्य तौर पर दिलीप के घर में घुसते ही वह सहम उठती, कभी उसके दिल को, वह घर के बाहर ठंड में बिताई रात का मंज़र सहमा देता।

टूट तो वह चुकी ही थी, अपने माँ बाप को भी कुछ ना कहती, पर उसकी ख़ामोशी उसके माता-पिता भली भाँति समझते, और उनका घुटना देख वह और भी घुटती। मंशा को अपमानित करने के लिए दिलीप को किसी बड़े कारण की ज़रूरत नहीं होती। बनियान में नील ज़्यादा लग गई थी सो उसका खामियाज़ा मंशा को अपनी हड्डी तुड़वाकर और अपने माँ बाप के लिए गालियाँ सुनकर भरना पड़ता।

दिलीप के बड़े भाई की बेटी की शादी थी, घर में इकलौती थी इसीलिए सभी की प्यारी थी। विवाह संपन्न कराया जा चुका था। दो दिन बाद रोमा का ससुराल से फोन आया, सभी ने बात की। दिलीप ने भी बड़े प्रेम से बात की, “बेटा तू ख़ुश तो है ना वहाँ, किसी बात की चिंता मत करना। कोई भी शिकायत होगी तो हमें तुरंत बताना, आख़िर इकलौती बेटी है, आँसू नहीं देख पाएँगे तेरे आँखों में।”

आज इतने वक़्त बाद मंशा के चेहरे पर हँसी आई थी, व्यंग्यात्मक ही सही।


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