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ISSN 2292-9754

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10.18.2018


अनिमेष

“डॉक्टर, ज़रा इस मरीज़ को देख लीजिये -नया मरीज़ है, हाई रिस्क केस है। अगर आप कहें तो इसे भर्ती करें, नहीं तो मेडिकल कॉलेज भेज दें।”

आज विभा की दोपहर की शिफ़्ट-ड्यूटी थी। ड्यूटी पर आते ही उसने सभी भर्ती मरीज़ों का परीक्षण किया, आवश्यक स्टाफ़ नर्स को निर्देश दिए और फिर अपने ड्यूटी रूम में आकर बैठी ही थी कि स्टाफ़ नर्स का बुलावा आ गया। उल्टे पैर वह पेशेंट देखने चली गयी। चलते-चलते पूछा, “क्यों क्या हो गया?”

“डॉक्टर, इसे ख़ून की कमी है, हाथ पैर में सूजन है और ब्लड-प्रेशर भी बढ़ा हुआ है।”

"ठीक है, मैं देख लेती हूँ। पेशेंट को मेडिकल कॉलेज मत भेजो। हाई रिस्क केस है कोई बात नहीं -ज़रा ज़्यादा ध्यान रखना पड़ेगा, मैनेज कर लेगें।" अब तक विभा ने पेशेंट का अच्छी तरह से परीक्षण कर लिया था। बच्चे की धड़कन भी सही थी। मरीज़ प्रथम बार प्रसव-पीड़ा से ग्रसित थी। पेशंट देख विभा सिस्टर्स ड्यूटी-रूम में आकर बैठ गई। केस पेपर भरते-भरते सिस्टर से बोली, "सिस्टर, यदि सभी मरीज़ों को मेडिकल कॉलेज भेजोगी तो सरकारी अस्पताल तो खाली हो जायेगें -थोड़ा रिस्क तो हमें भी उठाना चाहिए। हाँ, पेशेंट के हस्बैंड से रिस्क-नोट ज़रूर ले लेना।" केस पेपर में आवयशक निर्देश लिख कर विभा अपने ड्यूटी-रूम में आ कर बैठ गई।

डॉक्टर्स ड्यूटी-रूम और सिस्टर्स ड्यूटी-रूम पास-पास थे इसलिए सिस्टर की सारी बातें विभा को सुनाई पड़ ही रहीं थीं। पेशेंट का नाम शिवानी था… रिस्क-नोट लेने के लिए सिस्टर ने शिवानी के हस्बैंड को तलब किया तो पता चला वह किसी आवश्यक सामान को लाने घर गया है। बताने वाला स्वर महिला का था जो शायद शिवानी की रिश्तेदार थी। सिस्टर ने उसी महिला से कहा, “आप ही रिस्क नोट पर साइन कर दीजिये, शिवानी के हस्बैंड को आप बता देना, मैं उन्हें भी समझा दूँगी।”

रिस्क-नोट पर हस्ताक्षर करते-करते महिला बोली, "सिस्टर, अगर ज़्यादा परेशानी हो तो शिवानी को मेडिकल कॉलेज ले जायें?

“नहीं नहीं, मेडिकल कॉलेज ले जाने की ज़रूरत नहीं है, हम लोग देख लेंगे।” सिस्टर की बात सुनकर अच्छा लगा। 

लगभग एक घंटे के बाद विभा पुनः प्रसव-कक्ष में गई। मरीज़ों का परीक्षण किया और केस पेपर में आवश्यक निर्देश लिखने लगी। शिवानी का केस पेपर निकालते समय उसकी नज़र हस्बैंड के नाम पर गई जिसे देख कर वह चौंक गई। अपने ड्यूटी रूम में आने से पहले वह पुनः प्रसव-कक्ष में गई और शिवानी के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “प्रथम प्रसव में अधिक पीड़ा होती है। तुम परेशान मत हो, सब ठीक से हो जायेगा। में हूँ न यहाँ पर।”

अभी तक की सिस्टर और डॉक्टर की बातों से शिवानी चेहरे पर घबराहट साफ नज़र आ रही थी पर अब डॉक्टर की बातों से उसके चेहरे पर संतोष झलकने लगा। तभी उसे पुनः प्रसव-पीड़ा होने लगी। विभा ने उसे समझाया कि प्रसव-पीड़ा होने पर क्या करना चाहिए। पीड़ा समाप्त होने विभा ने शिशु की धड़कन सुनी और प्रसव-कक्ष से बाहर आ गई।

ड्यूटी रूम में आकर कुर्सी पर बैठ कर आँखें बंद कर, पुराने दिनों को याद करने लगी… कितनी मुसीबतों से उसने बच्चों को पाला था घर और अस्पताल की दोहरी ज़िंदगी के पाटों में पिसते-पिसते… कहीं कोई सहारा नहीं था। आदमी यह तो चाहता है कि उसकी बीबी नौकरी करके पैसा कमाये लेकिन घर के कामों में पत्नी की मदद करना उसे गवारा नहीं। मन हुआ तो बच्चों से थोड़ा हँस-बोल लिया, लेकिन ज़िम्मेदार बाप बन के उन्हें सम्भाल नहीं सकते। जब पति ही सहारा न दे उसके माँ-बाप से उम्मीद करना बेकार है। पति चाहता है पत्नी अपने हर कर्तव्य का पूरी तरह निर्वाह करे चाहे कितनी भी थकी क्यों न हो। सास-ससुर भी चाहते हैं बहू अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाये लेकिन पत्नी क्या चाहती है बहू क्या चाहती है, सोचने की किसी को फ़ुर्सत नहीं है। यही सब सोचते-सोचते विभा की आँख लग गई। 

अचानक सिस्टर की आवाज़ से विभा की आँख खुली, “डॉक्टर एक नया पेशेंट आया है… आकर देख लीजिए।”

विभा झट से उठी नया मरीज़ देखने परीक्षण-कक्ष में पहुँच गई। परीक्षण कक्ष से लौटते हुए वह प्रसव कक्ष में गई और शिवानी को देखा। परीक्षण कर के उसे आश्वस्त किया और वापिस ड्यूटी-रूम में आ गई।

ड्यूटी-रूम आते समय विभा ने देखा शिवानी का हस्बैंड बहुत परेशान था क्योंकि साथ आई डॉक्टर महिला ने रिस्क नोट किया था, और उसने उसे शिवानी के बारे में सब कुछ बता दिया था। कभी वह बेंच पर बैठ जाता तो कभी उठ कर इधर-उधर चक्कर लगाने लगता। इसी परेशानी में उसकी नज़र विभा पर नहीं पड़ी। 

धीरे-धीरे प्रसव की घड़ी नज़दीक आ गई। विभा शिवानी को ग्लूकोस ड्रिप लगवा दी जो धीरे-धीरे चल रही थी। आवश्यक इंजेक्शन भी समय-समय पर लगते रहे जिससे प्रसव आसानी से हो गया। सिस्टर नोट कर रही थी कि डॉक्टर इसमें कुछ ज़्यादा ही दिलचस्पी ले रही हैं। हर बार प्रसव कक्ष में जाकर शिवानी को देखने पर सिस्टर कहती, “डॉक्टर आप परेशान मत होइये। कोई बात होगी तो में आपको बुला लूँगी।” लेकिन विभा का मन नहीं मानता था और वह थोड़ी-थोड़ी देर में जाकर शिवानी को देखने प्रसव-कक्ष में जाती शिशु की धड़कन सुनती और वापिस आकर अपने कक्ष में बैठ जाती।

शिवानी को पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई थी। प्रसव के बाद कभी-कभी अधिक रक्तस्राव का ख़तरा रहता है अतः शिवानी लगातार दो तीन घंटे गहन देख-भाल की ज़रूरत थी। विभा ने शिशु को देखा। सिस्टर ने उसे साफ़-सुथरा कर के सफ़ेद कपड़े में लपेट दिया था। वह मुँह में अंगूठा डाल कर चूस रहा था, बिल्कुल विभा के बेटे की तरह। विभा ने उसे गोद में उठा कर चूम लिया। ख़ुशी से दो अश्रु-बिन्दु निकल कर शिशु पर गिर पड़े। शिवानी विभा को आश्चर्य से देख रही थी। इसका पता उसे वापिस पलट कर शिवानी की तरफ़ देखने पर चला। विभा ने शिशु को शिवानी के पास लिटा दिया। शिवानी के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए विभा ने उसका माथा चूमा। शिवानी की आँखें भर आईं, “डॉक्टर आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने मेरी डिलीवरी अच्छे से करवा दी।”

जवाब में विभा ने कहा, “बेटा हुआ है। माँ और बेटा दोनों सुरक्षित हैं। अपने हसबैंड से कहना… मेरा मुँह मीठा करा दें।”

ड्यूटी रूम में आकर विभा मैगज़ीन पढ़ने लगी। लगभग बीस मिनिट बाद दरवाज़े पर दस्तक़ हुई, “दरवाजा खुला है अंदर आ जाओ,” विभा दरवाजे की तरफ़ पीठ करके बैठी थी। द्वार खुला, कोई अंदर आया, “डॉक्टर, मिठाई। धन्यवाद डॉक्टर सुरक्षित प्रसव के लिए। आपने शिवानी का बहुत ध्यान रखा।”

“मिठाई स्टाफ़ में बाँट दो।”

“डॉक्टर, पहले आप तो खाइये फिर सारे स्टाफ़ को खिलाऊँगा।”

“अच्छा ये बताओ शिवानी की सास क्यों नहीं आई? यह तो प्रथम प्रसव था, उन्हें तो साथ आना ही चाहिए था और लगता पूरी गर्भावस्था के दौरान उन्होंने शिवानी का ध्यान भी नहीं रखा। यदि ठीक से देख-भाल की होती तो शिवानी की यह हालत न होती।”

"नहीं नहीं, डॉक्टर मेरी माँ पर तोहमत मत लगाइए। हम अपनी ग़लती की सज़ा भुगत रहे हैं। दरअसल हमने प्रेम विवाह किया था, विवाह में पिताजी की सहमति नहीं थी इसलिए प्रेगनेंसी के बारे उन्हें नहीं बताया। मेरी माँ बहुत अच्छी हैं अगर उन्हें पता होता तो शिवानी की यह हालत नहीं होती।” फिर धीरे से बोला, “मेरी माँ भी डॉक्टर हैं।”

“अच्छा तब तो मैं भी तुम्हारी माँ जैसी हुई। ठीक है अगर मिठाई खिलाना है तो पैर छू कर मिठाई खिलाओ वरना वापिस ले जाओ।”

परिस्थितियों से बचने के लिए अनिमेष ने विभा के पैर छुए। जैसे ही अनिमेष पैर छूकर उठा विभा ने उसे गले से लगा लिया।

“माँ!” भरे हुए गले से अनिमेष बोला। अब अनिमेष की समझ में आया शिवानी की अतिरिक्त देख-भाल का राज़। अनिमेष ने एक बार फिर से विभा के पैर छुए, “माँ मुझे माफ़ कर दो।”

“इसमें माफ़ी माँगने की क्या बात है? शिवानी से अच्छी बहू तो मैं ढूँढ़ नहीं पाती। रही पापा की बात तो मैं उन्हें मना लूँगी।”

माँ की बात सुनकर अनिमेष फूट-फूट कर रोने लगा।

“माँ मुझे विश्वास था, आप मुझसे नाराज़ नहीं हैं,” आँसू पोंछ कर उसने अपने आपको सम्भाला।

पढ़ाई पूरी होने के बाद अनिमेष की नौकरी दूसरे शहर में लग गई। वहीं उसकी मुलाक़ात अपनी सहकर्मी शिवानी से हुई जो धीरे-धीरे प्रेम में बदल गई। दीवाली के समय अनिमेष जब घर आया तो उसने शिवानी के बारे में अपने माँ और पिताजी को बताया था लेकिन पिताजी की सहमति नहीं थी। विभा पति का विरोध नहीं कर सकी। हार कर अनिमेष ने कोर्ट-मैरिज कर ली शिवानी को लेकर घर आने की हिम्मत नहीं हुई। इस बीच विभा का स्थान्तरण इस शहर में हो गया जिसकी जानकारी अनिमेष को नहीं थी। लेकिन आज नियति ने दोनों को इस तरह से मिला दिया। दोनों को दोहरी ख़ुशी मिली - विभा को बेटा और पोता मिलने की और अनिमेष को माँ और बेटा मिलने की।

“अच्छा बेटा सारे स्टाफ़ को मिठाई खिलाओ।" मिठाई का डिब्बा उठाकर अनिमेष सिस्टर्स ड्यूटी-रूम में गया लेकिन सिस्टर वहाँ नहीं थी, वह प्रसव कक्ष में शिवानी की ड्रिप देख रही थी। ख़ुशी के मारे अनिमेष प्रसव कक्ष में ही चला गया, “सिस्टर मुँह मीठा करिये!”

“अरे, अरे, आप, बाहर ही रुकिए। आप अंदर नहीं आ सकते।” अनिमेष को अपनी भूल समझ आ गई और वह बाहर आ गया। तभी विभा ने प्रसव-कक्ष में प्रवेश किया। शिवानी के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “यह मिठाई मेरे पोते होने की ख़ुशी में है।”

अब सिस्टर को समझ आया डॉ. विभा के बार-बार प्रसव कक्ष में आने का राज़।


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