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ISSN 2292-9754

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03.04.2016


डॉ. उर्मिलेश की ग़ज़लों में सामाजिक संवेदना

"ग़ज़ल" आधुनिक हिन्दी साहित्य की सबसे चर्चित विधा बन गयी है। दो पंक्तियों में समग्र जीवन का सार ग़ज़ल के शेर के रूप में अभिव्यक्त होता है। ग़ज़ल का एक-एक शेर हमारी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करता है। साठ तथा सत्तर के दशक में हिन्दी ग़ज़लें आम आदमी की ग़ज़लें बन गयी। यहीं से समकालीन ग़ज़लों का दौर चल पड़ा। "साये में धूप" के दुष्यन्तकुमार के बाद आज समकालीन हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में तीन पीढ़ीयाँ सक्रिय हैं। जिसमें डॉ. उर्मिलेश का नाम सशक्त ग़ज़लकार के रूप में उभरकर सामने आता है। आज हिन्दी ग़ज़ल आम आदमी का अंग बन गयी है। डॉ. उर्मिलेश की ग़ज़लों में आम आदमी और उसके बदलते जीवन संदर्भ दिखायी देते हैं। डॉ. उर्मिलेश ने मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं में आम आदमी की पीड़ा, आतंक, चापलूसी, आर्थिक यथार्थ, फरेब, सिफ़ारिश, आधुनिक परिवेश, महानगरीय जीवन की विद्रुपताएँ, निराशा का स्वर, स्वाभिमान आदि पर ग़ज़लों के माध्यम से प्रकाश डाला है। सत्ता और व्यवस्था के हाथों आम आदमी का जीवन, आम आदमी की छटपटाहट इन सारी स्थितियों पर डॉ. उर्मिलेश ग़ज़ल के माध्यम से प्रकाश डालते हैं।

राष्ट्रीय एकता ही साम्प्रदायिकता को नष्ट कर सकती है। सभी धर्मों को एक-दूसरे का आदर करने की प्रेरणा राष्ट्रीय एकता से ही मिल सकती है। परिन्दे किसी धर्म के नहीं बल्कि इन्सानियत के प्रतीक होते हैं। राष्ट्रीय एकता के सूत्र तो हमें परिन्दों से सीखने चाहिएँ। इस संदर्भ में डॉ. उर्मिलेश कहते है -

"परिन्दों के यहाँ फ़िरकापरस्ती क्यों नहीं होती
कभी मंदिर पे जा बैठे कभी मस्जिद पे जा बैठे"1

आम आदमी और मध्यवर्गीय जीवन के संदर्भ में डॉ. उर्मिलेश कहते हैं कि "ग़ज़लें मध्यवर्गीय जीवन की विडम्बनाओं और उसके खोखलेपन पर व्यंग्यात्मक प्रहार करती हैं। आज के जलते प्रश्नों से भी ये ग़ज़लें आँखें नहीं मूँदती।"2 डॉ. उर्मिलेश ने सौन्दर्य केंद्रित ग़ज़लें नहीं, बल्कि आम आदमी उसके भावबोध को लेकर ग़ज़लें लिखीं। "रोटी" के केन्द्र में भूख, दरिद्रता और बेकारी छिपी हुई है। रोटी के लिए व्यक्ति अत्याचार सहता है और रोटी के लिए ही निरंतर संघर्ष करता है। भूख से तड़प रहे बच्चे के मुँह तक रोटी न जा पाने का दोषी और ज़िम्मेदार कौन है, यह सवाल वे करते हैं। क्योंकि रोटी ऐसी चीज़ है जिसके पीछे सारी दुनिया घूमती है। भूखे बच्चों के ज़हन में हर वक़्त रोटी ही घूमती रहती है। तभी तो उस बच्चे को शून्य देखकर रोटी की याद आ जाती है -

"तुझको मुझसे लड़ा गयी रोटी
अपनी ताक़त दिखा गई रोटी
मैंने ज़ीरो बनाया कॉपी पर
याद बच्चे को आ गई रोटी"3

आज पाश्चात्य संस्कृति ने हमारे दिलो-दिमाग़ पर भी कब्ज़ा कर लिया है। भारतीय चूड़ी की खनक हम भूल गए हैं। अब तो प्लास्टिक की चूड़ी बाज़ार में मिलने लगी है। और वह भी "मेड इन" का लेबल लगा हुआ। पश्चिम की हवा तो अब बग़ीचे को भी लग गयी है। तभी से पंछी भी चहकना भूल गए हैं।

"इस क़दर प्लास्टिक हावी हुई अपने घर में
कान, बरसों हुये, चूड़ी की खनक भूल गये
जब से बाग़ में पश्चिम की हवा चल निकली
तब से पंछी भी यहाँ अपनी चहक भूल गये"4

डॉ. उर्मिलेश की ग़ज़लों में नए तेवर दिखायी देते हैं। व्यंग्यात्मक तेवर आपके ग़ज़लों की विशेषता है। व्यक्ति स्वातंत्र्य की छटपटाहट तथा राजनीतिक मकड़जाल में फॅंसे आमजन की पीड़ा को नया स्वर मिला है। चापलूसी और चाटुकारिता ने देश को दीमक की तरह चाट लिया है। चापलूसी के कारण जनकल्याणकारी योजनाओं की दुर्गति हुई है। आज जो शासन के दरबार में क़सीदे पढ़ते हैं, उनकी प्रशंसा करते हैं। अख़बारों में वहीं सुर्खियाँ बटोरता है; जो झूठा है, जो चापलूसी करता है। नेताओं के आम आदमी के प्रति असंवेदनशीलता तथा उदासीन रवैये को व्यंग्यात्मक ढंग से वे उजागर करते हैं -

"हमने सच बोल के गर्दन भी कटा ली अपनी
उसने तो झूठ कहा था मगर अख़बार में है"5

व्यक्ति को जीवन संघर्ष करना पड़ता है। बदलते इस जीवन संदर्भ में इस दौर का हाल नहीं लिखा जा सकता। समय आ गया है कि हाथों में कोई तीक्ष्ण कटारी चाहिए। क्योंकि जीवन एक संघर्ष बन गया है। डॉ. कुँअर बेचैन ऐसी तीक्ष्ण और धारदार ग़ज़लों के संदर्भ में कहते हैं कि "डॉ. उर्मिलेश की रसपूर्ण एवं धारदार ग़ज़लें कमल की पांखुरी पर तलवार का पानी हैं।"6 सार्थक जीवन जीने की तलाश करते हुए ग़ज़लकार कहते हैं -

"बेवज़ह दिल पे कोई बोझ न भारी रखिये
ज़िन्दगी जंग है, इस जंग को ज़ारी रखिये
कितने दिन ज़िन्दा रहे इसको न गिनिये साहिब
किस तरह ज़िन्दा रहे इसकी शुमारी रखिये"7

स्वातंत्र्योत्तर राजनीति का रूप आज कितना बदल गया है। आज आम आदमी की मुश्किलें बढ़ रहीं हैं। छोटी-छोटी चीज़ों के लिए उसे सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं। लाल फीताशाही में मनुष्य उलझकर रह गया है। आम आदमी राजनीति के गलियारों में कहीं खो गया है। यह राजनीति और उसकी कुर्सियाँ बड़ी उलटनेवाली होती हैं। सबकी आँखों पर राजनीति की पट्टीयाँ बॅंधी हुई हैं। एक अंधे धृतराष्ट्र को तो सह लेते पर पूरा शासन की धृतराष्ट्र बन बैठा है -

"एक धृतराष्ट्र को सह लेते
सबकी आँखों पे पट्टियाँ हैं अब
अब भला कैसे आग पकड़ेगी
सबकी-सब सीली तीलियाँ हैं अब"8

डॉ. उर्मिलेश की ग़ज़लों की अनुगूँज में समाज का हर तबका आया है। उनकी ग़ज़लें आशा की धूप है। डॉ. अशोक चक्रधर कहते है कि "उर्मिलेश की ग़ज़ल में भारत की आत्मा का वास है, मात्र देह नहीं। उनकी ग़ज़ल घट की सघन घटाओं से निकलने वाली आशा की धूप है, अंधेरे का मेह नहीं। उसमें उर से निकलने वाली प्रकाश की उर्मियों से बनी अनुभवजन्य अनुगूँजों की मालाएँ हैं, इसमें लेश-मात्र नहीं।"9 अब समय आ गया है कि ग़ज़लों को मक़्तों या मतलों से नहीं बल्कि राजमहलों से निकलना चाहिए। ग़ज़ल सिंहासन से उतरकर आम आदमी के पास जाएगी तो एक नयी जागृति लाएगी।

"मैं नहीं कहता कि तू मक़्तों या मतलों से निकल
ऐ ग़ज़ल, गर हो सके तो राजमहलों से निकल"10

आज रिश्ते-नातों से पैसा कितना बड़ा हो गया है। सभी का सपना आज "मनी मनी" हुआ है। "अर्थ" ही आज यथार्थ बन गया है। आज पैसों के जादूगर ने पैसों को इन्सान से भी बड़ा कर डाला है। इस सदी ने हम सबको यही दिया है। हालात यह हो गये हैं कि सभी इन्सानों को अब पत्थर बना दिया है। पैसे के कारण आज हमने सभी चीज़ों का सौदा कर डाला है। आम आदमी इतना विवश और दुर्बल बन गया है कि सुविधाहीन और अभावग्रस्त जीवन से उसे समझौता करना पड़ता है। आम आदमी के दुख-दर्द से वे गहरी सहानुभूति रखते हैं -

"मत पूछ इस सदी ने हम सबको क्या दिया है
इन्सान से बड़ा अब पैसा बना दिया है
जिसमें लिखी हुई थी इन्सानियत की बातें
उसने किताब से वो पन्ना हटा दिया है"11

कुल मिलाकर समसामयिक विषय तथा ज्वलंत समस्याओं को पैनी दृष्टि से ग़ज़लों में चित्रित किया है। डॉ. उर्मिलेश की ग़ज़लों में आम आदमी और उसके बदलते जीवन संदर्भ दिखायी देते हैं।

सारांश

सत्ता और व्यवस्था के हाथों आम आदमी का जीवन; आम आदमी की छटपटाहट इन सारी स्थितियों पर डॉ. उर्मिलेश ग़ज़ल के माध्यम से प्रकाश डालते हैं। आधुनिक समकालीन युग में पाश्चात्य संस्कृति की ओर हमारा मोह बढ़ता जा रहा है। इक्कीसवीं सदी का ग्लोबल इफ़ेक्ट हम पर भी छाया हुआ है। हमारे पारिवारिक रिश्ते, सांप्रदायिकता, सौंन्दर्य के केन्द्र में रोटी, भ्रष्टाचार, अंधविश्वास आदि सभी बातें सामाजिक युगबोध के अंतर्गत आती हैं। हमारे आस-पास जो घटित हो रहा है; हम उस समाज के ही हिस्सा है यह हम भूलते जा रहे हैं। हम जिस समाज में रहते हैं, उस समाज के प्रति हमारा भी दायित्व अपेक्षित है। परंतु क्या हम समाज के प्रति, परिवार के प्रति संवेदनशील हैं। यह सवाल ग़ज़लकार करते हैं।

संदर्भ

1. धूप निकलेगी; ग़ज़ल संग्रह : डॉ. उर्मिलेश पृ. 37
2. धुआँ चीरते हुए; ग़ज़ल संग्रह डॉ. उर्मिलेश पृ. ; भूमिका से
3. वही पृ. 76
4. वही पृ. 29
5. वही पृ. 65
6. वही; लैप से
7. वही पृ. 23
8. फ़ैसला वो भी ग़लत था; ग़जल संग्रह : डॉ. उर्मिलेश पृ. 40
9. धूप निकलेगी; ग़ज़ल संग्रह : डॉ. उर्मिलेश पृ. ; लैप से
10. धुआँ चीरते हुए; ग़ज़ल संग्रह : डॉ. उर्मिलेश पृ. 29
11. धूप निकलेगी; ग़ज़ल संग्रह : डॉ. उर्मिलेश पृ. 54

डॉ. अमोल दंडवते
रूख्मिणीताई कला एवं वाणिज्य महिला महाविद्यालय,
अमलनेर 425401. जि. जलगाँव, महाराष्ट्र, भारत
Email : amol.navgeet @gmail.com
mob. 09421535255


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