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02.27.2014


जब जब

जब कभी जहान भर की मुश्किलें और आफतें जाँ की थीं।
फरिश्तों सी सदा सर पर मेरे, दुआये माँ की थीं।।

जलती रही मुसलसल वो गीली लकड़ी की तरह।
मेरी ख़ुशियों के लिए उसने अपनी ज़िंदगी धुआँ की थी।।

उड़ गया मैं एक दिन उसके घोंसले से बड़ा होते ही।
इसी दिन के लिये क्या माँओं ने औलादें जवाँ की थीं।।

मेरे फूल से बच्चों को बंदूके थमा दीं किसने।
नानी से जो पूछते थे, परियाँ कौन थीं कहाँ की थीं।।

बरसों तलक तू मेरे मैं तेरे खून का प्यासा बना रहा।
गवां के सब कुछ जाना, क़ता तो सियासी जुबां की थी।।

उस गरीब बाप पर क्या गुज़री कुछ ख़बर नहीं।
पहले बेटी रुख़सत हुई, और अब बारी मकां की थी।।

यहाँ क़ामयाबी उन चन्द लोगों को ही नसीब हुई।
कदम जमीं पे थे जिनके, मगर तैयारी आसमां की थी।।


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