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ISSN 2292-9754

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10.20.2017


जलायें कुछ...

जलायें कुछ
हृदय की देहरी पर
दिए सौहार्द के
सुंदर सजीले

झोंपड़ी तमस में है
अगर डूबी
दीप अश्लील हैं
अट्टालिका के
नए परिधान में
सब बेल बूटे
फटे कपड़े
अकिंचन बालिका के
जलाओ एक दिन
दीपक वहाँ भी
जहाँ पलते हैं
सपनों के क़बीले

निर्वसन और
निर्वासित हुई है
मनुजता की प्रतिष्ठा
कहाँ जाने
करें शृंगार इसका
फिर धरा पर
यही त्योहार हैं
इसके बहाने
अनगिनत नेह के
दीपक जलाएँ
पड़ेंगे स्वार्थ के
कुछ बंध ढीले

अँधेरे में पड़ी
मन की अयोध्या
सजाए दीप हमने
किन्तु सर पर
कपट मन में
कुलाँचे मारते हैं
स्वांग आराधना का
है निरंतर
बुहारें चलो अब
अंत:करण को
नहीं हैं राम जी भी
कम हठीले


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