अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.14.2014


"शृंखला की कड़ियाँ"- नारी-मुक्ति की दिशा

नारी मुक्ति का आन्दोलन एक लम्बी यात्रा के बाद ऐसे मुकाम पर पहुँच गया है जहाँ एक ओर तो उसकी सफलता के गीत गाये जा रहे हैं एवं दूसरी ओर नारी मुक्ति को पश्चिम से आयातित होने का आरोप लगाया जा रहा है। परन्तु भारतीय चिन्तन परम्परा पर दृष्टि डालें तो यह सिद्ध हो जाता है कि नारी मुक्ति आन्दोलन पश्चिम की देन नहीं है। नारी मुक्ति आन्दोलन को महत्वपूर्ण दिशा देने वाली "सीमोन दे बोउवार" (1949) की पुस्तक "द सेकेण्ड सेक्स‘ से पूर्व महादेवी वर्मा जी की "शृंखला की कड़ियाँ" (1942) पुस्तक आ चुकी थी। प्रस्तुत पुस्तक में महादेवी जी ने नारी जीवन की विसंगतियों, समस्याओं, अधिकारों एवं स्वतन्त्रता आदि प्रश्नों को उठाया साथ ही तर्कपूर्वक कारणों का उत्तर देते हुये समाधान प्रस्तुत किया। अतः प्रस्तुत पुस्तक में महादेवी जी ने नारी मुक्ति का मार्ग तलाशने का सशक्त एवं सार्थक प्रयास किया। इस पुस्तक में महादेवी जी नारी स्वतंत्रता, अधिकारों, सामाजिक-व्यवस्था, नारी जीवन की विसंगतियों के लिये पुरुष एवं सामाजिक व्यवस्था को उत्तरदायी नहीं मानतीं। वे स्वयं इन स्थितियों एवं समस्याओं के लिये नारी में चेतना के अभाव, शिक्षा के अभाव को उत्तरदायी मानती हैं। इसी कारण वे कहती हैं- "वास्तव में अँधकार स्वयं कुछ न होकर आलोक का अभाव है।" उनका नारी विषयक चिन्तन बड़े शालीन ढंग से वर्चस्ववादी समाज व्यवस्था पर अनेक सवाल खड़े करता है।

"शृंखला की कड़ियाँ " में उनकी संवेदना के बौद्धिक एवं सामाजिक पक्ष का उद्घाटन हुआ है। रूढ़िवादी समाज और पुरुष प्रधान परम्परावादी दृष्टिकोण का एक तेजस्वी-नारी द्वारा सांस्कृतिक सार पर तीव्र प्रतिवाद किया गया है।

महादेवी जी प्रस्तुत पुस्तक में नारी की सम्पूर्ण समस्याओं के मूल कारणों में उसकी आर्थिक परवशता एवं शिक्षा का अभाव मानती हैं। उनके अनुसार "समाज में स्त्री-पुरुष सम्बन्ध में अर्थ ऐसा विभाजन है जिसके कारण वे उत्तराधिकार से वंचित नहीं वरन् एक प्रकार से विवशता के बन्धन में बँधी हुई हैं। इस कारण पुरुष ने स्वामित्व की शक्ति का लाभ उठाकर उसे इतना परावलम्बी बना दिया कि उसके सहारे के बिना स्त्री एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकती। स्वामित्व का यह बन्धन सामन्तवादी व्यवस्था की देन है।" नारी की परन्त्रता में महादेवी जी अर्थाभाव एवं स्वामित्व प्रदर्शन को महत्वपूर्ण मानती हुई कहती हैं कि जब तक नारी की इस अर्थ बन्धन से मुक्ति नहीं होगी, स्वयं आत्मनिर्भर नहीं होगी तब तक उसका शोषण, अस्तित्व, स्वतन्त्रता, अधिकार संभव नहीं है। वह अपनी पुस्तक में इसका प्रतिरोध कई बार करती हैं। साथ-साथ नारी के स्वावलम्बन, आत्मविश्वास, एवं ज्ञान की आवश्यकता पर बल देती हैं। वे नारी को पुरुष की सहधर्मचारिणी और सहभागिनी के रूप में देखती हैं। उनके अनुसार नारी का कार्य है, अपने सहयोगी की प्रत्येक त्रुटि को पूर्ण कर उसके जीवन को अधिक से अधिक पूर्ण बनाना। परन्तु वास्तविकता यह है कि यह स्त्री स्वतन्त्रता से रहित पति की छाया मात्र रही।

महादेवी जी नारी स्वतन्त्रता, बाधक में मूल कारण परम्परागत विवाह बन्धन को मानती हुई, नारी के विकास में बाधक, सामाजिक विवाह बन्धन के संशोधन के लिये कहती हैं। उनके अनुसार स्त्री अपनी क्षमतानुसार अलग-अलग क्षेत्र में कार्य करे एवं अपनी स्वाभाविक चेतना के वशीभूत होकर विवाह करे न कि अर्थ सुरक्षा की मजबूरी में। अन्त में विवाह सम्बन्धी सामाजिक बन्धनों, सामन्तवादी दृष्टिकोण का विरोध करती हैं। अतः इस सम्पूर्ण स्त्री समस्याओं का मूल कारण शिक्षा का अभाव मानती हैं। वे शिक्षा को नारी मुक्ति का उपाय बताते हुये कहती हैं, "इस समय हमारा इष्ट स्वतन्त्रता है, जिसके द्वारा हम अपने जंग लगे बन्धनों को एक प्रयास में काट सकते हैं। इसके लिये शिक्षा चाहिये, उसे चाहे किसी भी मूल्य पर क्रय करना पड़े। परन्तु महादेवी जी ने शिक्षा का उपयोग जीवन के अर्थ समझने, नारी स्वतन्त्रता अधिकारों हेतु महत्वपूर्ण माना न कि सुयोग्य वर या जीवकापोर्जन हेतु। महादेवी जी कहती हैं कि नारियाँ शिक्षा ग्रहण कर अपने उत्तरादायित्व को समझते हुये सम्पूर्ण कार्य क्षेत्रों में अपना योगदान दें। अतः वे नारियों की पूर्ण स्वतन्त्रता हेतु राजनीति एवं सार्वजनिक क्षेत्रों में सहयोग की बात करती हैं। शासन व्यवस्था में नारियों की भागीदारी के सम्बन्ध में महादेवी जी कहती हैं "शासन व्यवस्था में उन्हें स्थान न मिलने से आधा नागरिक समाज प्रतिनिधिहीन रह जायेगा। अपने स्वत्वों के रूप एवं आवश्यकता से स्त्रियाँ जितनी परिचित हो सकती है उतने पुरुष नहीं। परन्तु स्थान मिलने का अर्थ यह नहीं कि उन्हे केवल पुरुषों की परिषदों को अलकृंत करने के लिये रखा जाये।"

इसी प्रकार शिक्षा एवं चिकित्सा क्षेत्र में स्त्रियों की सेवा भावना की भागीदारी की भूमिका में कहती हैं कि स्नेह, वात्सल्य भावना, केवल स्त्रियों में होती है इस कारण वे इस क्षेत्र में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सकती हैं। इस सम्बन्ध में कहती है - "बालकों की मानसिक शक्तियाँ स्नेह छाया में जितनी पुष्ट और विकसित होती हैं उतनी अन्य उपाय से नहीं।"

कानून के क्षेत्र में महादेवी जी नारी की सहभागिता की अपेक्षा रखती हैं क्योंकि स्त्री सम्बन्धी न्यायिक मामलों में उन्हें सही न्याय मिल सके एवं महिलाओं के प्रति हो रहे अन्याय की समस्याओं को सामने लाया जा सके। इस प्रकार महादेवी जी स्त्रियों से सम्पूर्ण सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र में भागीदारी की अपेक्षा रखती हैं। साथ-साथ स्त्रियों की शिक्षा एवं जागरूकता, आत्मबल एवं आत्मविश्वास की आवश्यकता पर बल देती हैं। परन्तु इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि स्पष्ट है नारियों के लिए इन सभी क्षेत्रों में पुरुषवादी सकीर्ण मानसिकता एवं परम्परावादी रूढ़िवादी दृष्टिकोण नारी स्वतन्त्रता, अधिकारों की मुक्ति में बाधक है। अतः वे पुरुष से सहानुभुति एवं सहयोग की अपेक्षा रखती हैं। उनका कहना है कि "पुरुष यदि वशानुक्रमागत अधिकार युक्त अनुदार भावना को छोड़ सके तो बहुत सी कठिनाइयाँ स्वयं दूर हो जायेंगी। इसके अभाव में न तो स्त्री मुक्त हो सकेगी न समाज मे अपना सहयोग कर सकेगी।" स्त्री जब घर से बाहर भी अपना कार्यक्षेत्र रखेगी, तो पुरुष को उसे स्वतन्त्रता देने पड़ेगी। उसे आने-जाने, अन्य व्यक्तियों से मिलने-जुलने की एवं उसी क्षेत्र में कार्य करने वालों से सहयोग की आवश्यकताएँ पड़ती रहेंगी। ऐसी दशा में पुरुष उदार न हुआ और प्रत्येक कार्य को संकीर्ण और संदिग्ध दृष्टि से देखा तो जीवन असह्य हो उठेगा। परन्तु इस स्वतन्त्रता के बाद नारी के असावधानी से बढ़ते कदमों के प्रति चिन्ता व्यक्त करती हुई कहती हैं कि "इतना ध्यान रखना चाहिए कि बेड़ियों के साथ-साथ ही उसी अस्त्र से, बन्दी यदि पैर भी काट डालेगा तो उसकी मुक्ति की आशा, दुराशा मात्र रह जायेगी।" अतः इसी प्रकार प्रस्तुत पुस्तक में महादेवी जी ने भारतीय परिप्रेक्ष्य में स्त्री की मुक्ति, समस्याओं, अधिकारों, स्वतन्त्रता के लिये पुरुषवादी दृष्टिकोण को दोषी नहीं ठहराया वरन् इसके लिये स्वयं नारी को दोषी मानती हैं। वे इसके मूल में नारी चेतना, शिक्षा के अभाव को मानती हैं, साथ-साथ नारी में शिक्षा, जागरूकता, आत्मबल, आत्मविश्वास की आवश्यकता पर बल देती हैं। सामाजिक व्यवस्था, पुरुषवादी मानसिकता के परिवर्तन की माँग करते हुये नारियों की राजनीति, शिक्षा, कानून, चिकित्सा के क्षेत्र में सहभागिता की अपेक्षा करती हैं। वे नारी को पुरुष नहीं विवेकशील, विचारवान एवं चेतना सम्पन्न नारी बनाने पर ज़ोर देती हैं। अतः सम्पूर्ण विवेचन से स्पष्ट है कि महादेवी जी ने "शृंखला की कड़ियाँ" पुस्तक में जो नारी स्वतन्त्रता, मुक्ति सम्बन्धी समस्याओं एवं समाधान सम्बन्धी विचार व्यक्त किये, वे आज भी हमारे सामाजिक सन्दर्भ में प्रासंगिक एवं पथ प्रदर्शक हो सकते हैं।

सन्दर्भः-

1. "शृंखला की कड़ियाँ - महादेवी वर्मा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-2008.

डॉ. एलोक शर्मा
138.139, श्यामा प्रसाद मुखर्जी नगर,
निवाई, जिला-टोंक (राज.) 304021
9261515507


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें