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03.13.2014


स्वयं से संघर्ष करती कहानियां: "स्वयं के घेरे"
डॉ. अमिता दुबे

कृतिकार : अलका प्रमोदस्वयं के घेरे - अलका प्रमोद
प्रकाशक : सुलभ प्रकाशन
17, अशोक मार्ग, लखनऊ
प्रथम संस्करण : 2013
मूल्य : 150/-
पृष्ठ सं. : 100

"सच क्या था", "धूप का टुकड़ा", "समान्तार रेखाएँ" के बाद चौथे कहानी संग्रह के रूप में कथाकार अलका प्रमोद की कृति "स्वयं के घेरे" वर्ष 2013 में प्रकाशित हुई है। 13 कहानियाँ का यह संग्रह वरिष्ठ रचनाधर्मी ममता कालिया को समर्पित किया गया है। "कुछ कहना है" के अन्तर्गत अलका प्रमोद स्पष्ट कहती है-

"कहीं-कहीं नारी सशक्तिकरण और आधुनिकता की दौड़ में वह दिग्भ्रमित भी हो गयी है, उचित दिशा निर्धारण और सीमा तय न की गयी तो स्वयं अपना ही अहित होने का अंदेशा है। इस बात को उसे समझना होगा और अपनी भावना और कर्म के संतुलन को बनाकर राह तय करनी होगी। इसी चिंतन को मैंने अपनी कहानियों में ढालने का प्रयास किया है।"

"स्वयं के घेरे" कहानी संग्रह की सभी कहानियाँ समाज के अलग-अलग पक्षों को केन्द्र में रखकर लिखी गयी हैं। कुछ कहानियाँ तो सामाजिक सच्चाइयों का विद्रूप चेहरा दिखाते हुए समाधान की कोई किरण भी प्रस्तुत करती हैं तो कहीं-कहीं दोराहे पर खड़ी कहानी के साथ-साथ समस्या के समाधान के विकल्प को भी समाज अथवा पाठक के लिए छोड़ दिया गया है। दोनों प्रकार की कहानियों में अलका प्रमोद ने पात्रों के साथ पूरा-पूरा न्याय किया है।

संग्रह की पहली कहानी शीर्षक कहानी है, अर्थात "स्वयं के घेरे"। आधुनिकता का लबादा ओढ़े कहानी की नायिका अर्चिता अपने माता-पिता तक को "आउट डेटेड" समझती है और समय-समय पर उन्हें जताती भी रहती है। विवाह को बंधन मानने वाली लड़की स्वतंत्रता पूर्वक अपने पुरुष मित्र मलय के साथ रहना प्रारम्भ करती है, निजी जीवन में दखल न देने की शर्त पर, उसका मन प्रेम के बंधन में बँधने लगता है लेकिन उसका साथी उसे छोड़कर चल देता है और वह रह जाती है नितांत अकेली। माता-पिता के पास लौटे कि न लौटे की दुविधा में वह "स्वयं के घेरे" तोड़ने के लिए बढ़े हाथ को शिथिलता से रोक लेती है, सच ही है आगे बढ़े कदम आसानी से पीछे नहीं किये जा सकते। आम समस्या को आम ढंग से लेते हुए कहानी का ताना-बाना कथाकार ने बुना है। कोई अप्रत्याशित अंत इस कहानी को कमज़ोर कर सकता था अलका ने सुन्दर ढंग से इसे प्रस्तुत किया है।

"सोचा भी न था" कहानी में एकाकी परिवार में कामकाजी दम्पत्ति की विवशता को दिखाया गया है, जहाँ बच्चे की देखभाल के लिए नौकरानी ही एक मात्र सहारा होती है वही नौकरानी जब बच्चे को भीख माँगने वालों के हवाले करती है और बच्चा रोये नहीं इसलिए कोई नशीली चीज़ उसे पिलायी जाती है तो पति-पत्नी हतप्रभ रह जाते हैं। लेकिन नौकरी छोड़ने के विकल्प पर तनया परेशान हो जाती है क्योंकि ऋण की देनदारी सुरसा के समान मुँह फैलाये उसे डरा रही थी। उसकी समस्या का समाधान रूठी सास के अचानक आगमन से होता है जो अपने पोते के लिए बद्तमीज़ बहू के पुराने व्यवहार को भूलकर पुनः गाँव से आ जाती है। अच्छा समाधान प्रस्तुत किया है कथाकार ने। वास्तव में हमें लौटना तो अपनी जड़ों की ओर ही होता है।

"मम्मा यू आर ग्रेट" कहानी में कैरियर की होड़ पति-पत्नी के बीच तनाव और फिर अलगाव का कारण बनता है। लेकिन बेटी की पहल पर अपने घर में अपनी शर्त पर पति के साथ दोबारा रहते को तैयार हो जाती हैं "आईना" कहानी में "लेडीज़ क्लब" की "पंचायत है तो "भोर की रश्मियाँ" कहानी में नृत्य के प्रति समर्पित वामिका अपने को सिद्ध करती है परिवार के विरोध के बाद भी।

"अब नहीं" , "इस मोड़ पर", "एक पहिये की गाड़ी" कहानी को नायिकाएँ परिस्थितियों से समझौता नहीं करतीं; उनसे जूझती हैं और अपना रास्ता स्वयं बनाती हैं दूसरों के लिए पथप्रदर्शक बनती हैं। "पर हित सरिस धरम नहीं भाई" कहानी एक अपाहिज मानसिकता को रेखांकित करती है जहाँ माँ-बाप, सास-ससुर को तो मान-सम्मान देखभाल नहीं देते और समाज सेवा करते हुए विभिन्न पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित होते हैं।

संग्रह की अंतिम कहानी है "किलकारी"। यह कहानी एक ऐसी बेटी की कहानी है जो माँ की सखी की आधुनिक जीवन प्रणाली से प्रभावित होकर बच्चों को झंझट समझती है। लेकिन नीमा आंटी की सच्चाई जानकर उसकी सोच बदल जाती है।

विभिन्न सम्मानों और पुरस्कारों से सम्मानित कथाकार अलका प्रमोद का यह कहानी संग्रह सामाजिक मूल्यों की पड़ताल करते हुए महिला चरित्रों का ऐसा रूप सामने लाने में सक्षम हुआ है जहाँ स्वयं के घेरे तोड़ती हुई स्त्री स्वतंत्रता के संघर्ष को मू़र्त रूप दिखायी देती हैं। उनके सभी पात्र परिस्थिति वश जिन समस्याओं से जूझते हैं उनसे निकलने का रास्ता भी लेते हैं। सभी कहानियाँ कथ्य, शिल्प, भाषा की दृष्टि से अलग दिखायी देती हैं। कुछ सोचने और करने को विवश भी करती हैं।

सुलभ प्रकाशन, लखनऊ द्वारा प्रकाशित कहानी संग्रह "स्वयं के घेरे", सुन्दर आवरण पृष्ठ, त्रुटिहीन मुद्रण और आकर्षक कलेवर के पठनीय बन पड़ा है। कथाकार अलका प्रमोद के साथ-साथ प्रकाशक को भी बधाई।

डॉ अमिता दुबे
प्रकाशन अधिकारी
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान
लखनऊ


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