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09.22.2007
 
वास्तु की महिमा
अलका चित्राँशी

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आज मैं आप लोगों के समक्ष अपनी जीवन भर की उपल्ब्धियों से प्राप्त सुख की कहानी लेकर उपस्थित हूँ।

सर्वप्रथम अपने व्यक्तित्व से आरम्भ करता हूँ खूबसूरती में ऋतिक रोशन और तुषार कपूर मेरे पैरों की धोवन भी नहीं हैं। मेरे नैना सी हीयर बट लुक देयर’, नाक ऐसी देखकर लगता है कि मिटीरियल कम पड़ जाने पर भगवान ने ऊँचाई को चौड़ाई में फैलाकर सींक से दे छेद कर दिये, सोचिये सुरसुरी होने पर क्या हाल होता होगा मेरा, गनीमत है कि साहित्यकार हूँ अपनी लेखनी सदा सर्वदा अपने पास रखता हूँ। दाँत देने वाले ने मेरी तोंद का आकार ध्यान में रखते हुए दिल खोलकर तनिक चौड़े बना दिये जिससे कि मैं अतिशीघ्र अपनी क्षुधा को शान्त कर सकूँ और खिलाने वाल भाँप पाये कि मैंने कितना खाया। मेरे कान महापुरुषों की भाँति तनिक बड़े और रंग एकदम शीतल छाँव! शीश पर केश मेरे अमीर होने का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

ये तो था मेरा सुन्दर सलोना व्यक्तित्व, अब मेरी शिक्षा-दीक्षा एवं योग्यताओं के बारे में। मैंने अपने गाँव के विद्यालय से शिक्षा प्राप्त की हर वर्ष प्रोन्नति पाता हुआ बड़ी कुशलता से अपनी शिक्षा पूरी की। मेरी प्रोन्नति से खुश होकर माँ हर वर्ष परीक्षाफल मिलने के उपरान्त घर में पिताजी के घोर विरोध के बाद भी अखण्ड रामायण का पाठ करवाती। पिताजी कुछ कहते तो लड़ पड़ती कि खुद को कार्यालय में प्रोन्नति मिलेगी तब मिठाई बाँटोगे पर बच्चे के लिये मैं इतना भी नहीं कर सकती। लेकिन पिताजी के विरोध का कारण आज समझ में आता है। मेरी काहिलियत देखकर पिताजी अक्सर कहा करते नहीं पढ़ोगे तो हल चलाओगे। इस डर से स्वत: ही कब कलम-कागज से प्रेम हो गया याद नहीं। आज अपनी जीविका का साधन मात्र एक कलम है। मेरे साहित्यिक व्यक्तित्व को घर के बाहर ही आदर-सम्मान मिल पाता है अपनों के बीच तो मैं घर की मुर्गा साग बराबर वाली कहावत चरितार्थ कर रहा हूँ।

यहाँ तक तो गनीमत थी, लेकिन अब तो हद ही हो गयी है। सभी जानने वाले मुझे अब साहित्यिकार कम सनकी ज्यादा समझते थे। उन्होंने मुझे यह उपनाम कब प्रदान किया और क्यों इसका सारा श्रेय मेरी श्रीमतीजी को जाता है। पिछले हफ़्ते उनकी सहेली के घर लेडीज़ संगीत का कार्यक्रम था उस संगीत कार्यक्रम से लौटकर वास्तु का जो आलाप मेरे घर में प्रारम्भ हुआ वह निरन्तर गुन्जायमान है।

मुख्यद्वार पर लगे सुन्दर हरितिमा बिखेरते मेरे प्रिय दो अशोक वृक्ष श्रीमती जी के वास्तु प्रेम की भेंट पहले ही दिन चढ़ गये। तर्क के आगे मैंने हथियार डाल दिये वह कहने लगीं रावण ने सीता हरण के बाद उन्हें अशोक वाटिका में रखा था, इसलिए घर में यह वृक्ष कतई नहीं। मैं क्या करता चुपचाप उन्हें और कटे वृक्षों को अपलक निहारता रह गया। यही सोच कर संतोष कर लिया कि द्वार की नहीं तो वृक्ष की लकड़ियाँ शीत ऋतु में घर के अन्दर आतिशदान की ही शोभा बढ़ायेंगी। इस पर भी उस समय पानी फिर गया जब श्रीमतीजी ने उन कटे वृक्षों को घर के बाहर खड़े उन बच्चों को ले जाने के लिए कह दिया जो शायद सूखी टहनियों की तलाश में ही टहल रहे थे। वे सभी बच्चे श्रीमती जी की तारीफ़ के कसीदे पढ़ रहे थे और मैं मन ही मन कुढ़ा जा रहा था।

फिर एक दिन बाजार से ऐसा यन्त्र ला कर द्वार पर टाँग दिया जो कॉल बेल सा बज-बज कर मेरी तन्द्रा भंग करने में कोई कसर बाकी रखता और मेरी कलम खीज का प्रमाण कागज पर उकेर देती। पूछने पर पता चला द्वार पर टंगा मेरे जी का जंजाल विंड चाइम्स कहलाता है और इसे टाँगने से शान्ति पूर्ण वातावरण बना रहता है। सच कहता हूँ बन्धु जिस दिन से यह घर में टंगा है उसी दिन से घर की शान्ति, काम करने वाली बाई की तरह बिना बताये जाने कहाँ गायब हो गई है।

ऐसे वातावरण में जब मेरी लेखनी ने कागज पर चलने से मना कर दिया तो मैं पास के पार्क में उसे रोज सुबह शाम टहलाने ले जाने लगा।
शाम का ही तो वक्त था जब मैं अपनी लेखनी के साथ सैर करके लौटा था, देखा कि श्रीमतीजी बुक शेल्फ़ से मेरी पुस्तकें जमीन पर डाल रही हैं और एक रद्दी वाला उन्हें पोंछ-पोंछ कर करीने से बाँध रहा है तौलने के लिये। लगा कि कहीं गश खाकर गिर पड़ूँ, इसलिए सिर पकड़ कर बैठ गया। जब थोड़ा नार्मल हुआ तो श्रीमती जी से शेर की तरह दहाड़ कर पूछा- “यह क्या तमाशा है मेरी किताबों रद्दी नज़र आती हैं। श्रीमती जी ने नहले पर दहला मारा और मुझसे भी तेज शेरनी की तरह दहाड़ते हुए बोलीं- “मेरा घर कोई कबाड़खाना नहीं है जो भी कागज़ पत्तर मिले रखते जाओ। तुम्हारी यही रद्दी तो घर की ऊर्जा को नकारात्मक बना रही है। देख नहीं रहे तुम्हारे कबाड़ की वजह से मेरा घर एक अजायबघर बन गया है।

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