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12.06.2008
 

ग़म का सितारा
अली सरदार जाफ़री


मेरी वादी में वो इक दिन यूँ ही आ निकली थी
रंग और नूर का बहता हुआ धारा बन कर
वादी=घाटी; नूर=प्रकाश

महफ़िल-ए-शौक़ में इक धूम मचा दी उस ने
ख़ल्वत-ए-दिल में रही अन्जुमन-आरा बन कर
महफ़िल-ए-शौक़=प्रेम-सभा; ख़ल्वत-ए-दिल=हृदय का एकान्त /विरह
अन्जुमन-ए-आरा=सभा का शृंगार

शोला-ए-इश्क़ सर-ए-अर्श को जब छूने लगा
उड गई वो मेरे सीने से शरारा बन कर
सर-ए-अर्श=सातवाँ-स्वर्ग; शरारा=चिंगारी

और अब मेरे तसव्वुर का उफ़क़ रोशन है
वो चमकती है जहाँ ग़म का सितारा बन कर
तसव्वुर=दिवास्वप्न/कल्पना; उफ़क़=क्षितिज


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