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12.06.2008
 

 एक जू-ए-दर्द से जिगर तक रवां है आज
अली सरदार जाफ़री


एक जू-ए-दर्द से जिगर तक रवां है आज
पिघला हुआ रगों में इक आतिश-फ़िशां है आज
जू-ए-दर्द=पीड़ा की नदी; रवाँ=बहना/चलना
रग़=नाड़ी; आतिश-फ़िशां=ज्वालामुखी

लब सी दिये हैं ता न शिक़ायत करे कोई
लेकिन हर एक ज़ख्म के मुँह में ज़बां है आज
ता=ताकि

तारीकियों ने घेर लिया है हयात को
लेकिन किसी का रू-ए-हसीं दर्मियां है आज
तारिकी=अँधेरा; हयात=जीवन; रू=चेहरा; हसीं=सुन्दर

जीने का वक़्त है यही मरने का वक़्त है
दिल अपनी ज़िन्दगी से बहुत शादमां है आज
शादमां=प्रसन्न

हो जाता हूँ शहीद हर अहल-ए-वफ़ा के साथ
हर दास्तान-ए-शौक़ मेरी दास्तां है आज
अहल-ए-वफ़ा=विश्वसनीय; दास्तान-ए-शौक़=प्रेमकथा

आए हैं किस निशात से हम क़त्ल-गाह में
ज़ख्मों से दिल चूर नज़र गुल-फ़िशां है आज
निशात=प्रसन्नता; क़त्ल-गाह=वध-स्थल; चूर=टूटा हुआ; गुल-फ़िशां=फूलों को फैलना

ज़िन्दानियों ने तोड़ दिया जुल्म का ग़रूर
वो दब-दबा वो रौब-ए-हुकूमत कहाँ है आज
ज़िन्दानी=बन्दी; ग़रूर=अभिमान; दब-दबा=तड़क-भड़क;
रौब=धाक / डर / त्रास; हुकूमत=शासन


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