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ISSN 2292-9754

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01.16.2018


कील
डॉ. अखिलेश शर्मा

वह
प्रतिदिन आती है, जाती है
आफ़िस में बॉस/सहकर्मी
घर पर/बूढ़ा बाप और अंधी माँ
पढ़ने वाले छोटे भाई बहिन/पति और बच्चे
सब इंतज़ार करते हैं उसका
कील है/धुरी है वह
उसके आसपास सिमटे संसार की
आशान्वित है वह/कि एक दिन
समझेगा समाज उसके दोहरे श्रम के मूल्य को
फिर वह सब नहीं होगा
जो घट रहा है आज
और स्थापित कर देगी वह
अपनी शाश्वत अस्मिता को


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