अखिल भंडारी

कहानी
ग़लतफ़हमी
दीवान
इक मुसाफ़िर राह से भटका हुआ
कभी तो अपनी हद से निकल
किनारे पर खड़ा क्या सोचता है
गलियों गलियों शोर मचा है
दरीचा था न दरवाज़ा था कोई
जहाँ में इक तमाशा हो गए हैं
मिलने जुलने का इक बहाना हो
रोज़ पढ़ता हूँ भीड़ का चेहरा
कविता
तीन मौसमी कविताएँ
वापसी