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ISSN 2292-9754

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02.19.2015


सबसे सस्ते दिन

ईश्वर का नाम लेकर पांडेजी ने मोटरसाइकल को किक मारी। वैसे तो एक लात में चालू हो जाने वाली उनकी प्रिय बाइक, कभी धोखा नहीं देती, पर इस बार चालू नहीं हुई। पांडेजी का हृदय धक से रुका, पर सोचा चलो कोई बात नहीं हो जाता है कभी-कभी, पहली बार नहीं तो दूसरी बार सही। पांडेजी ने पुनः प्रयास किया, फिर असफल। उनका हृदय समझ नहीं पा रहा था की धड़कना बंद करे या तेज़ धड़के। फिर किक मारी गयी, फिर असफल, पांडेजी ने पत्नी, का सौम्य मुख देखा जो रौद्र होने के लिए बस इसी क्षण की प्रतीक्षा में था। पांडेजी को बीते हुए दो दिनों की याद आ गयी, उनका वर्णन थोड़ा रुक कर करेंगे, किंतु अभी बाइक चालू नहीं हो रही थी, पांडेजी का हृदय भी रुकने या बंद होने का निर्णय नहीं ले पा रहा था। जैसे ही आँखें ऊपर करते पत्नी का मुख हर बार से अधिक रौद्र प्रतीत होता था। होंठो की लाली आँखों में और आँखों का काजल उनके शब्दों में उतरने के लक्षण प्रतीत हो रहे थे। अब वो थक गये थे, पर प्रयास ज़ारी था, जिस क्षण लगा कि अब उनकी अर्धांगिनी, रुष्ट होकर पुनः गृह प्रवेश करने जा रही हैं, उसी क्षण बाइक और उनके हृदय ने पुनः धड़कना प्रारंभ कर दिया। हालाँकि पत्नी का मूड बिगड़ गया था पर, शॉपिंग का मामला था, उनको ही जाना था, इसलिए तुरंत मान गयीं, और एकदम मेंढक जैसे फुदक कर बाइक पर बैठ गयीं। पांडेजी की जान में जान आई और वे चल पड़े, आज ट्रैफिक तो नहीं था किंतु गर्मी ने प्राण सोख लिए थे, लू की चपेट में गाड़ी चलना दूभर हो रहा था। परंतु महाराणा प्रताप की भाँति वो अपने घोड़े को वायु की गति से दौड़ा रहे थे।

जैसे-तैसे मॉल तक पहुँचे, अब समस्या थी बाइक को कहाँ फँसाया जाए, देखा तो पूरी पार्किंग में दुपहिया वाहन लगे नहीं थे एक दूसरे से चिपके खड़े थे, जैसे कि बस में 2 की सीट पर तीन तन्दरुस्त यात्रियों को बैठा दिया जाता है। लग रहा था जैसे एक बाइक दूसरे से कह रही हो बहन थोड़ी सी जगह दे दे, मेंरी किक फँस रही है, दूसरी कह रही हो बहन मैं क्या करूँ बाजू वाली बाइक ने मेरे अगले टायर में अपना साइलेंसर घुसा रखा है। और तीसरी बाइक खुद ही इस संकीर्ण-स्थान के कारण प्राण त्यागने के लिए व्याकुल होती हुई, चिल्ला रही थी, जैसे कि उसका कोई हरण कर के ले जाने वाला हो। उसके चिल्लाने (अलार्म) से परेशान बाकी सभी बाइक चुपचाप खड़ी हो गयी थीं, जैसे कि भारी बस में एक महिला यात्री किसी पुरुष यात्री पर चिल्ला दे तो, सारी बस शांत हो जाती है, चुपचाप सुनने लगती है। पांडेजी ने, सोचा अपनी बाइक को कहाँ इस भीड़ में लगाऊँ , बेचारी बाइक, नाज़ों में पली है, इस निर्मोही निष्ठुर संसार में इन बाइक की भीड़ में कहीं कोई चोट न लग जाए। हा! मेरी प्यारी बाइक। किंतु पत्नी का भय, और स्वयं के अगले कई दिनों के खाने की जुगाड़ को ध्यान में रखते हुए, अपनी बाइक, को कहीं न कहीं लगाने का फ़ैसला कर चुके थे। अब उन्होंने पूरे पार्किंग का एक चक्कर लगाया, और उन्हें दो बाइक के बीच में उतना स्थान दृष्टि-गोचर हुआ जितना कि होली के पहले दिल्ली से बिहार जाती हुई अंतिम ट्रेन में घुसे हुए यात्री को किसी सीट पर अपने कूल्हे टिकने भर के लिए स्थान दिखा हो। उन्होंने मौका देखते हुए तुरंत अपनी बाइक लगा दी। बाइक फँसा कर लौटे पांडेजी थोड़ा सा निश्चिंत हुए, चलो कुछ तो ठीक हुआ।

प्रवेशद्वार पर पहुँचे तो देखकर हैरान, बाहर इतनी भीड़, अंदर का माहौल कैसा होगा ये देखकर थोड़े चिंतित हुए! दरअसल बाहर जो भीड़ थी वो ट्रॉली के लिए थी, लोगों को ट्रॉली नहीं मिलेगी तो ढेर भर का समान कैसे ख़रीदेंगे। फिर कैसे पता चलेगा कि ये दिन सबसे सस्ते दिन हैं! तो अब घोर समस्या थी ट्रॉली कैसे प्राप्त की जाए। इतनी भीड़, सब ट्रॉली देख कर झपटने को व्याकुल, किसी भी प्रकार से अपने सभ्य कुल के होने का प्रमाण नहीं दे रहे थे, पर पांडेजी को सभी स्वयं की तरह मजबूर लगे। हर पुरुष का मुख उन्हें दर्पण में अपना प्रतिबिंब लगा। हर स्त्री के मुख पर उन्हें खरीददारी करने का अद्वितीय, साहस, बल और ढृढ़ निश्चय दिखा। समस्या अभी भी वहीं थी, ट्रॉली कहाँ से लाई जाए। उनकी पत्नी का दिमाग़ दौड़ा, और बोली, चलो हमारे साथ। पांडेजी उनके साथ चलने ही तो आए थे, सो चल दिए, बिना सोचे समझे। पत्नी जी उन्हें कार पार्किंग की तरफ़ ले गयीं। पांडेजी समझे नहीं कि अचानक उनकी पत्नी को ये क्या सूझा। वहाँ जाकर पांडेजी ने देखा कि कुछ कार वाले शॉपिंग कर के ट्रॉली को कार पार्किंग तक ला कर वहीं छोड़ गये थे, जहाँ से कदाचित्, थोड़ी-थोड़ी देर में स्टाफ के लोग इकट्ठा कर के ले जाते होंगे। परंतु यहाँ कहानी थोड़ी अलग थी। उनकी पत्नी ने इशारा किया, पांडेजी समझे और लपक कर एक ट्रॉली पकड़ ली। उसमें अपने बालक को फँसा दिया और एक विजयी मुस्कान के साथ दोनों अंदर जाने को तैयार हुए। पार्किंग से ट्रॉली को खींच कर लाने में वैसे तो पांडेजी संकोच करते किंतु आज बात अलग थी आज सबसे सस्ते तीन दिनों का अंतिम दिन, अपार जनसमूह, उस पर ये विजय। धन्य, धन्य हो बाज़ारवाद की नयी परिभाषा। जब कुछ बिक न रहा हो तो उसके लिए एक माहौल बना दो। लोगों को लगना चाहिए कि सस्ता मिल रहा है, उसके बाद सब कुछ पत्नियों पर छोड़ दो।

सबसे सस्ते तीन दिन से याद आया कि पांडेजी को ये तीन दिन कैसे बहुत महँगे पड़े ये बताना बहुत ज़रूरी है।

तो हुआ यूँ कि टी.वी., अख़बार, रेडियो और पोस्टर - बैनरों में सर्वत्र, कुछ दिनों से एक विज्ञापन चल रहा था। सबसे सस्ते दिन। सभी पत्नियों की तरह पांडेजी की पत्नी भी उत्सुक थी, इन सबसे सस्ते दिनों का लाभ उठाने के लिए। तो पहले दिन सुबह-सुबह पत्नी जी ने अनुरोध किया - हे प्राण-नाथ, चलिए, कुछ सस्ता सा खरीद लाते हैं। पांडेजी बोले - ठीक है प्रिये, शाम को चलेंगे। फूटी किस्मत थी उनकी जो जाते-जाते ये कह गये, शाम को एक मीटिंग आ गयी और पांडेजी को देर हो गयी। घर पहुँचे तो सुबह जो पत्नी के गुलाबी गाल देख कर गये थे, वो परिपक्व होकर पूर्ण रूप से लाल हो चुके थे। लग रहा था की वो तैयार हुई थी और फिर ...। रहने दीजिए लिखने से क्या फायदा, आप समझ ही गये होंगे। पांडेजी ने समझाने की कोशिश की, किंतु भोजन नहीं मिला, सोचा चलो आज बाहर से मँगाया जाए, तो शायद पत्नी जी को कुछ तसल्ली मिले। खाना मॅंगा लिया गया, खाया गया और पांडेजी निद्रा में लीन हो गये। परंतु सर्वविदित है कि - क्रोधित नारी अत्यंत भारी।

अगले दिन पांडेजी को न चाय मिली, न नाश्ता, और टिफिन - वो भी बताने की ज़रूरत नहीं है। पांडेजी समझ चुके थे की मामला कुछ गंभीर हो गया है। परंतु धीर बने रहे, और सुनाते हुए कह गये की आज शाम को जल्दी आ जाएँगे, तैयार रहना। आज का खाना फिर दफ़्तर की कैंटीन में हुआ। जब बुरा समय आता है तो थोड़ा बहुत नहीं आता, थोक के भाव में आता है। आज भी पांडेजी लाख कोशिश करने के बाद भी समय से दफ़्तर से न निकल पाए, भय ने उन्हें ग्रास बना लिया, चेहरा घर पहुँचने से पहले ही उतर गया था, और रात के खाने की फ़िक्र सताने लगी थी। समझ गये थे की आज शाम फिर बाहर का ही खाना है, और कल पक्का उनका पेट जवाब दे देगा।

घर पहुँचे, आज घर पूर्ण रूप से कोप-भवन समान लग रहा था, तात्पर्य यह था कि कैकेयी कोप-भवन मैं बैठी थी और दशरथ की प्रतीक्षा कर रही थी। पांडेजी ने याद किया, पर उन्हें अपनी पत्नी के सिवा किसी और से युद्ध हुआ हो ऐसा याद नहीं आया, न उन्हें याद आया की पत्नी कभी सारथी बनके उनके प्राणों की रक्षा करने साथ गयी हो। परंतु अपने शॉपिंग पर ले जाने के वचन अवश्य याद आ रहे थे। उन्होंने आज समझाने की कोशिश नहीं की, वो जानते थे कोई फायदा नहीं है। चुपचाप खाना ऑर्डर कर दिया और बोले, कल रविवार है, कल चलते हैं। बाकी उनकी निजी बातें हैं, जो यहाँ लिखना शोभा नहीं देता। किंतु बस उसके बाद सुबह की घटना का वर्णन मैं ऊपर कर ही चुका हूँ।

तो वर्तमान में पांडेजी, मॉल के अंदर थे, ट्रॉली उनके हाथ में थी, और अब बाकी उनकी पत्नी को खरीददारी करनी थी। उन्होंने एक सज्जन को अपनी पत्नी से कहते सुना - सुनोजी आज रहने दो बहुत भीड़ है हमसे न हो पाएगा। और वे सज्जन सपत्नीक वहीं से बाज़ार को दंडवत करते हुए लौट भी गये, बिना कुछ खरीदे। वे सोचने लगे हे राम!! ये कैसे संभव हुआ। बिना खरीदे कैसे लौट गये ये लोग। काश दोबारा कभी मिलें तो इस रहस्य को भी जाना जाए।

दूसरी तरफ उन्होंने देखा बेतहाशा भीड़ में लोग हर चीज़ उलट-पुलट कर देख रहे थे, कीमत का तमगा, उस पर डिसकाउंट का पर्चा, हर तरफ लालच का जाल, कपड़े, बर्तन, आटा, दाल, सब्जी, दूध सब कुछ बिक रहा था डिस्काउंट में। लूट सको तो लूट लो। एक तरफ खड़े होकर अपनी पत्नी को कुछ सामान पलटते हुए देख रहे थे, तभी एक व्यक्ति आया और बोला, सर, क्रेडिट कार्ड लेंगे? पांडेजी ने प्रेम से मना कर दिया। थोड़ी देर बाद यहाँ-वहाँ घूम के पांडेजी फिर एक कोने में खड़े थे, तब फिर वही व्यक्ति आया और बोला, सर क्रेडिट कार्ड लेंगे? पांडेजी ने पुनः मना कर दिया। थोड़ा समय और कटा और फिर पांडेजी 4 कदम चले, फिर वही महानुभाव पधारे…और फिर पूछा क्रेडिट कार्ड लेंगे? पांडेजी ने कहा भैय्या तीसरी बार पूछ रहे हो अब मत आना। शायद क्रेडिट कार्ड वाला भी भ्रमित था। इतनी भीड़ किस-किस को पहचाने।

पांडेजी ने देखा लोगों ने अपने बच्चों को तरह-तरह से ट्रॉली में भर रखा है, किसी ने सुला रखा है किसी ने बैठा रखा है। बच्चे परेशान हो रहे हैं लेकिन सब शॉपिंग में मगन। लोगों की ट्रॉलियाँ भरी हुई हैं, कभी भूसे के ट्रक देखे हैं सड़क पर, लगता है, जाने कब फट पड़ेंगे। बस वैसे ही, ट्रॉलियाँ ऐसे भरी हुई जैसे बस ज़रा सा धक्का लगे और सब बिखर जाए। तो धीरे-धीरे उनकी पत्नी ने भी आटा, दाल से लेकर कपड़े, बर्तन, साबुन तेल, और न जाने क्या-क्या खरीद के ट्रॉली भर दी थी। पांडेजी समझ गये थे कि चपत तो लंबी लगने वाली है। पर ज्यों-ज्यों ट्रॉली भरती जाती पांडेजी को एक तो सुकून होता जाता कि चलो और ज़्यादा समय नहीं जल्दी ही यहाँ से निकलने का मौका मिलेगा। परंतु दूसरी बात जो उनको घोर चिंता में डाल रही थी वो ये कि इतना सामान वो लेकर कैसे जाएँगे। एक बार उनकी पत्नी ने इतनी ही शॉपिंग कर डाली थी, एक साथ, बाइक पर कैसे ले गये थे वो ही जानते हैं। कम से कम 7 बार एक्सीडेंट होते बचा होगा। स्कूटर हो तो भी घर का सामान लाने ले जाने में आसानी होती है, लेकिन गृहस्थ के लिए बाइक लेकर शॉपिंग पर जाना कितना बड़ा क्लेश है वही समझ सकते हैं जो इस प्रक्रिया से गुज़रे हैं।

तो जैसे-तैसे ट्रॉली भर चुकी थी। और अब बारी थी बिल कराने की। जब काउंटर पर पहुँचे तो देखा इतनी लंबी कतारें, जैसे किसी हिट फिल्म के टिकट के लिए लोग खड़े हों। एक एक कतार में 25-25 लोग और हर व्यक्ति के पास ट्रॉली में 250-250 सामान, एक-एक को बिल करने में 15-20 मिनिट लग रहे थे। पांडेजी एक वीर की तरह, एक लाइन में लग गये। लाइन बढ़ने का नाम नहीं ले रही थी, पर वे लगे रहे। फिर वो घटना हुई जिसने इन सबसे-सस्ते दिनों को निचोड़ के रख दिया। तीन दिन बाहर का खाना खा के पांडेजी का उदर गुटर-गुटर तो पहले से कर रहा था, अब लघुशंका से आशंकित हो गये थे, भागने के लिए लालायित थे परंतु समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। इतने में वो क्रेडिट कार्ड वाला पुनः पांडेजी के पास आ गया, इस बार पांडेजी से रहा नहीं गया और उसपर खीझ उठे...ला दे! अभी दे, अभी दे, अभी दे! मुझे अभी चाहिए, एकदम अभी। क्रेडिट कार्ड वाला सकपका के खिसक गया। परंतु पांडेजी अपना आपा खो बैठे थे। वैसे तो शांत-चित्त पांडेजी क्रोधित नहीं होते परंतु इन तीन दिनों से धीरे-धीरे उनके अंदर ज्वालामुखी भर दिया था।

इतने पर भी पत्नी को दया नहीं आई, किंतु बालक को उनपर दया आ गयी, शायद पुत्र से अपने पिता का कष्ट नहीं देखा गया। और जिस शंका से पांडेजी पीड़ित थे, और बस सोच रहे थे कि क्या करें, उनके बालक ने वो कर दिखाया। और अब इतने सबके बाद उनका बालक रुदन करने लगा। भीड़ कम हो नहीं रही थी। लाइन आगे बढ़ नहीं रही थी। बालक रो रहा था। भारतीय स्त्री की एक ख़ास बात है, पति पर क्रोध इतनी जल्दी शांत करती नहीं, परंतु बच्चे का कष्ट एक क्षण देखती भी नहीं। बालक को परेशान होते देख कह उठीं चलो अब चलते हैं,छोड़ दो ये सामान यहीं। पांडेजी के कानों में जैसे अमृत घुल गया हो, ये शब्द उन्हें "आइ लव यू" से अधिक अच्छे लग रहे थे। वे समान छोड़ के भागे और भागे भी तो सीधे गुसलखाने की तरफ, अपनी शंका का निवारण करने जो की अत्यंत आवश्यक था।

जब लौटे तो शांत मुद्रा में बोले क्षमा करना शॉपिंग नहीं हो पाई। पत्नीजी को भी आख़िर हँसी आ गयी। बोलीं चलो कुछ खाकर ही घर चलते हैं कम से कम चैन से सो तो लेंगे।


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