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ISSN 2292-9754

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12.18.2014


आँगन की धूप – कविता की वापसी है
डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’

पुस्तक : ‘आँगन की धूप’
कवि : आचार्य बलवन्त
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मंदिर,
नेहरू मार्ग, दाउजी रोड, बीकानेर
संस्करण : 2013

कविता मानव-मेधा की सर्वोत्कृष्ट उपज है। ज्ञात साहित्य में ऋग्वेद का प्रथम मंत्र (अग्निसूक्त) छन्दोबद्ध रचना है। लौकिक संस्कृत के प्रारंभ के मूल में कविता है। वाल्मीकि का शोक श्लोक बन गया जिसे लौकिक संस्कृत कविता का प्रथम छन्द कहा गया। रामायण, महाभारत जिनसे भारत की पहचान है, कविता रूप में ही तो हैं। कालिदास, तुलसीदास, जयशंकर प्रसाद आदि की रचनाओं का महत्त्व उनमें सन्निहित उत्कृष्ट काव्य तत्त्व तथा सामाजिक समरसता का सार्वकालिक सन्देश है। छायावाद के पश्चात एक ऐसा दौर आया जिसमें कविता के स्थापित तथा परम्परागत प्रतिमान अमान्य किये जाने लगे। कविता का नया व्याकरण गढ़ा जाने लगा, जिसमें तुक, ताल, लय, प्रवाह, यति, गति की कोई चिन्ता नहीं। कहा गया कि कविता अब ऐसे ही ठीक है, अब वह ‘बंधन मुक्त’ हो गयी है। कोई भी व्यक्ति जीव-निर्जीव यदि बंधन में, अनुशासन में, मर्यादा में नहीं है तो उसे उचित नहीं माना जाना चाहिए। पर बहुमत के आगे दो-चार लोगों की विमति कोई विशेष अर्थ नहीं रखती। फिर भी सबका स्वाद-आस्वाद अलग-अलग होता है। जिन्हें कविता में रस, छन्द, अलंकारादि के साथ वर्तमान सामाजिक परिवेश की संगतियों/विसंगतियों को पढ़ना हो, अनुभव करना हो, उन्हें आचार्य बलवन्त रचित गीत संग्रह ‘आँगन की धूप’ अवश्य पढ़ना चाहिए।

‘आँगन की धूप’ का प्रतीकार्थ, निहितार्थ तथा बिम्बार्थ विलक्षण तथा विस्मयकारी है। आँगन हृदय तथा मन का भी प्रतीक है। जब हृदय में ज्ञान की धूप तथा मन में सहानुभूति का प्रकाश रहेगा तब ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ (सबको अपने जैसा समझने का भाव) की भावना बलवती होगी, जिसकी आज नितांत आवश्यकता है। आँगन की धूप वाकई में सूर्य की रोशनी है। इस संग्रह की कविताएँ उसी तरह स्वयमेव चल रही हैं जैसे झरने से पानी स्वयमेव झरता रहता है।

आचार्य बलवन्त की कविताओं में शब्द सामर्थ्य के साथ ही अर्थगाम्भीर्य भी है। उनके लिए कविता मात्र शब्द जाल या चीखने चिल्लाने का सुलभ साधन नहीं है अपितु वह अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति के साथ मानवता के उच्च प्रतिमानों की स्थापना का उपयोगी उपकरण भी है। ‘आँगन की धूप’ की शुरुआत ‘कविता का धर्म’ नामक कविता से हुई है। कविता को परिभाषित करने का प्रयत्न अतिप्राचीन काल से ही मनीषियों द्वारा किया जा रहा है। किसी ने शब्द तथा अर्थ के संयोग को काव्य कहा (भामह) तो किसी ने रसात्मक वाक्य को (विश्वनाथ) काव्य माना। मम्मट ने कहा कि दोष रहित गुण सहित अलंकार समन्वित शब्द तथा अर्थ काव्य है। आचार्य बलवन्त कविता की इन परम्परागत परिभाषाओं की लीक से हटकर कहते हैं कि-

कविता जगाती है,
उठने के लिए उकसाती है,
कविता कोलाहल से नहीं उपजती,
कलरव से आती है।
* * * *
कविता उठने - बैठने का हुनर देती है,
संभलना सिखाती है।

इन पंक्तियों में गूढ़ एवं गम्भीर भाव छिपे हैं। कविता वह है जो व्यक्ति को सक्रिय करती है। दूसरे शब्दों में कविता कर्मवाद की परिपोषिका है, वह बैठे-ठाले की दिमागी ऐय्याशी नहीं है। कविता हल्ला बोल नहीं करती। वह सकारात्मक रीति से हृदय परिवर्तन का माध्यम है। कविता मधुरता की जननी है, समरसता की परिपोषिका है। कविता नीति और न्याय शास्त्र है। वह व्यक्ति को नीतिवान तथा शास्त्रसम्मत आचरण करने की प्रेरणा देती है। कविता तहज़ीब, तमीज़ तथा सलीका सिखाती है। यह सच है कि कविता सुखद, शुभद तथा सर्वमंगलकारी जीवन-शैली की भित्ति है। आचार्य बलवन्त कविता को उस रूप में देखते हैं जिस रूप में वह सामाजिक चेतना, सार्वजनिक प्रगति का प्रथम सोपान है। कविता का यही स्वरूप उपयोगी तथा समीचीन भी है। आचार्य भामह ने लिखा है कि संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं जो कविता का विषय न बन सके। कवि का दायित्व बहुत बड़ा होता है। कविता जीवन के प्रत्येक मोड़ पर खड़ी है। आचार्य बलवन्त के शब्दों में-

कसक में, सिसक में, चहक में, चमक में,
दमक में, खनक में, समायी है कविता।
ज़मीं, आसमां में, समूचे जहाँ में,
मुहब्बत के रंग में रंगायी है कविता।

कविता का लक्ष्य संवेदना को जाग्रत कर सहानुभूति को बलवती करना है। कबीर ने ठीक ही कहा है कि—

जा घट प्रेम न संचरे
सो घट जान मसान।

आचार्य बलवन्त की कविता उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ से सच्ची मानवता का द्वार खुलता है। अपनत्व का राग उठता है। समत्व का उद्घोष होता है। एकत्व का अनुमान ही नहीं प्रत्यक्ष होता है। उनका कथन है कि-

उजड़ न जाये आशियाँ, ये आशियाँ संवार दो।
धर्म पर जो धारणा है द्वेष की, उतार दो।
गीत को ग़ज़ल, ग़ज़ल को गीत का श्रृंगार दो,
आदमी हो, आदमी को, आदमी का प्यार दो।

आँगन की धूप की कविता ज़िन्दगी का सच्चा दस्तावेज़ है। हक़ीक़त बयानी है। इसकी कविताओं में युग बोलता है। वर्तमान परिस्थितियाँ प्रतिध्वनित होती हैं। पाठक को प्रतीत होता है कि यह कविता मेरे लिए लिखी गयी है। कवि ने मेरे दर्द को कैसे पहचान लिया? वस्तुतः कवि त्रिकालद्रष्टा होता है। उसकी तीसरी आँख और छठीं इंद्रिय से कुछ छिपा नहीं रह सकता है। कवि उस चिकित्सक जैसा बड़ा विशेषज्ञ होता जो नाड़ी परीक्षण के बाद रोग बतलाता है। कवि ‘सहृदय’ होता है। यही ‘सहृदयता’ उसे अन्य से पृथक करती है। आचार्य बलवन्त की कविता में जीवन-दर्शन है, वर्तमान त्रासदी का चित्रण है,मतलब परस्त आदमी का खाका, नक्शा है। उनके शब्दों में- हर तरफ़ ख़ौफ़ का बाज़ार नज़र आता है।

मेरा मुंसफ़ ही गुनहगार नज़र आता है।
आज के दौर की बातें न करें,
लूटनेवाला पहरेदार नज़र आता है।
बात किससे करें हिफ़ाज़त की,
आज मुज़रिम ही थानेदार नज़र आता है।

आचार्य बलवन्त की कविताओं में गेयता, ध्वन्यात्मकता तथा भावप्रवणता का मणिकञ्चन संयोग है। शब्दों में प्रवाह तथा अर्थ में लालित्य पद-पद पर परिलक्षित होता है। प्रतीक और बिम्ब के सहारे अपनी बात को सलीके से कहने में प्रवीण हैं-
कोयल को आता नहीं गीत गाना

चुराया किसी ने है उसका तराना।
पिलाया किसी ने ज़हर धीरे-धीरे।
चले जा रहे हम किधर धीरे-धीरे?

कविता घोर तमिस्रा में प्रकाश स्तम्भ है। कवि घोर निराशा में आशा की किरण है। कविता निबल का बल तथा सम्बल है। कविता प्रेरणा है, जोश है, राग-अनुराग है। कविता क्या-क्या है, थोड़े शब्दों में नहीं कहा जा सकता-कवि का कथन है कि-

इन दीयों से दूर न होगा, अन्तर्मन का अंधियारा।
इनसे प्रकट न हो पायेगी, मन में ज्योतिर्मय धारा।
प्रादुर्भूत न हो पायेगा, शाश्वत स्वर ओमकार का।
चलो, दिवाली आज मनायें, दीया जलाकर प्यार का।

कविता कोरी कल्पना नहीं होती है। कविता में कृत्रिम कमनीयता की गिनती नहीं होती है। कविता स्वार्थ का पहाड़ा नहीं है। उसमें अपनत्व का जोड़, दुश्मनी का ऋण होता है। इसमें हृदयों का भाग नहीं, मेल होता है। कविता का शेष विशेष होता है और यही विशेषता मनुष्यता की मीमांसा-विवेचना है। कवि ने जोर देकर कहा है कि--

मानवता का मान बढ़ेगा, मानव धर्म निभाने से ।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, क्या होगा कहलाने से ?
तुमको तप्त धरा के तन-मन पर होगा मोती बिखराना।
विश्वासों के दीप जलाकर, अंधकार को दूर भगाना।
हुई रक्तरंजित वसुंधरा, थर्राई हैं दशों दिशाएं।
कूंक हुई कड़वी कोयल की, दहशत से भर गईं हवाएं।
सुर हो गया पराया अब, कल तक जो था जाना-पहचाना।
विश्वासों के दीप जलाकर, अंधकार को दूर भगाना।


आँगन की धूप की कविताएँ चिन्तन परक हैं। इनमें सुसंदेश है। मधुरता के साथ कर्मवाद का उद्घोष भी है। कौन नहीं जानता की आज बेटी यातना के किस दौर से गुज़र रही है। बेटी की प्रशंसा में न जाने कितने गीत लिखे गये पर हक़ीकत क्या है? तुलसी से अच्छा कौन बतला सकता है। ‘कत विधि नारि सृजी जग माहीं।’ ‘पराधीन सुख सपनेहुँ’ स्त्री उस परम्परा के खूँटे से बँधी है जहाँ कहा गया कि नारी की कुमारावस्था में पिता, यौवनावस्था में पति, तथा वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करता है। स्त्री कभी स्वतंत्र नहीं रह सकती। इस कथन की जितनी भी ऊँची दार्शनिक व्याख्या कर नारी महत्त्व को प्रतिपादित किया जाय पर कड़वी सच्चाई यही है कि वह अपने विषय में स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकती। कुछ भी हो बेटी नामक कविता बेहद मर्मस्पर्शी है, संवेदनात्मक तथा भावपूर्ण है। आचार्य बलवन्त के शब्दों में--

चेहरे की मुस्कान है बेटी।
घर आयी मेहमान है बेटी।
क्षमा, प्रेम, करुणा की मूरत,
ईश्वर का वरदान है बेटी।
जीवन की आशा है बेटी।
उज्ज्वल अभिलाषा है बेटी।
हिन्दू की होली, दिवाली,
मुस्लिम की रमज़ान है बेटी।

पारिवारिक विघटन आज की भयावह समस्या है। जब परिवार टूटता है तब मन टूटता है और जब मन टूटता है तब दिलों में दरार पड़ती है। रक्त संबंधी एक दूसरे के रक्त पिपाषु बन जाते हैं। कवि आज व्यथित है। उसे उन दिनों की याद आ रही है, जब बाबा की चौपाल बरगद के नीचे लगती थी। गाँव की समस्याएँ हल होती थीं। गाँव की बहन-बेटी पूरे गाँव की बहन-बेटी होती थी। किसको कब कहाँ मदद करनी है, बाबा की चौपाल में तय होता था। गाँव का गरीब अपने को अकेला नहीं समझता था। उसकी बेटी के ब्याह में गाँव वाले तन मन धन से सहयोग करते थे। समय ने करवट बदला। अपने पराये हो गये। अब बिना किसी स्वार्थ के कोई किसी से बोलता नहीं। पहले घाटा-मुनाफा देख लेता है तब अगला कदम धरता है। टी.वी. ने बच्चों का समय ले लिया, वे बाबा के पास बैठते ही नहीं। कवि की वेदना व्यक्तिगत नहीं, सार्वजनिक है, जिसमें वर्तमान परिवेश की भयावह त्रासदी हमें मुँह चिढ़ा रही है-

बूढ़ा बरगद देख रहा युग की अंधी चाल।
बरसों से सूनी लगती है बाबा की चौपाल।
पाँवों की एड़ियाँ फट गईं,
बँटवारे में नीम कट गई,
कोई खड़ा है मुँह लटकाए, कोई फुलाए गाल।
बरसों से सूनी लगती है बाबा की चौपाल।
बाँट दी गई माँ की लोरी,
मुन्ने की बँट गई कटोरी,

इस संग्रह के सारे गीतों में चेतना है, मानवीय संवेदना है। मैं मानता हूँ कि ‘कविता’ की वापसी है जो ‘कविता’ विगत पचास-साठ सालों से कहीं खो गयी थी, वह मिल गयी है।

कोई भी रचना सर्वांगीण शुद्ध परिनिष्ठित नहीं कही जा सकती। उक्त उदाहरण ‘मुंह’ की जगह ‘मुँह’ लिखा जाना चाहिए। एक कविता का शीर्षक है मुझे भी जरा गुनगुनाना सीखा दे। मेरी दृष्टि में ‘सीखा’ की जगह ‘सिखा’ उपयुक्त है। छपाई-सफाई ग्रंथ की आकृति-प्रकृति सुरूपता की साक्षी हैं। भागवत संस्कृति का उत्कर्ष सर्वथा सराहनीय। कवि को उर्दू भाषा पर भी अधिकार है। शब्दों का सम्यक ज्ञान और उसका समुचित प्रयोग इस काव्यकृति की विशेषता है। कवि में कवित्व प्रतिभा जन्मजात है, ऐसा प्रतीत होता है। यदि कवि काव्य प्रतिभा योग्यता तथा क्षमता का प्रयोग महाकाव्य की रचना में करे तो उत्तम होगा। यदि कवि आचार्य बलवन्त की ललित लेखनी भगवती वीणापाणि की समाराधना में निरन्तर निरत रही तो उससे विलक्षण कृति की प्रबल संभावना है।

डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’
एसोसिएट प्रोफेसर तथा शोध पर्यवेक्षक
संस्कृत विभाग, सन्त तुलसीदास
स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
कादीपुर सुल्तानपुर (उ.प्र.) पिन-228145
मो. 9532006900


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