अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.08.2016


तन के भूगोल से परे स्त्री मन की गाँठें खोलती अमृता प्रीतम की कहानियाँ

"तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के मन की गाँठें खोलकर
कभी पढ़ा है तुमने उसके भीतर का खौलता इतिहास"1

- निर्मला पुतुल

दुनिया की संस्कृति साझी रही है। मानव जाति की अस्मिता भी इसी की गवाह रही है। स्त्री एवं पुरुष के रूप में दो तत्व मनुष्यता के विकास के दो आयाम रहे हैं। यद्यपि स्त्री मनुष्य की उर्वरता में बराबर की साझेदार रही है किन्तु जहाँ पर बात विचारों एवं अधिकारों की आती है वहाँ स्त्री का पक्ष प्रायः शून्य रहा है। इस शून्यता में थोड़ी सी हलचल 90 के दशक में पैदा होती है। जब भूमण्डलीकरण का दौर शुरू हुआ। भूमण्डलीकरण ने तेज़ी से बुनियादी चीज़ों का गला घोंटा है। इसका कारण यह है कि परम्परा अपने आप नहीं टूटती; बल्कि उसके लिए उचित माहौल की आवश्‍यकता होती है। भूमंडलीकरण ने लोगों का जबरन बदलाव कर दिया। एक फ़ार्मूला विकसित करके उसे सब पर थोप दिया गया।

साहित्य में स्त्री विमर्श की उत्पत्ति भी कुछ ऐसी ही रही । पश्‍चिमी विचारकों ने नारी मुक्ति के लिए जो विचार प्रस्तुत किये उन्हीं से स्त्री विमर्श का उदय हुआ। यह माना जाने लगा कि स्त्री ने अपना पिंजरा तोड़ डाला। स्त्री की वेषभूषा तथा देह मुक्ति के सवाल तेज़ी से उठे। और धीरे से "स्त्री मुक्ति का रूपांतरण" देह मुक्ति में हो गया। यह समझा जाने लगा कि यही स्त्री सशक्‍तीकरण है। स्त्री मुक्ति का इतिहास बाद के समय में मात्र एक नारा बन कर रह गया। इसका सर्वप्रथम कारण यह था कि पश्‍चिम की स्त्री को ही एशियाई देशों की स्त्री समझा गया। हक़ीक़त इससे इतर थी। पश्‍चिम की सबसे शोषित स्त्री एशियाई स्देशों की स्त्री से कहीं ज़्यादा सशक्त थी। हिन्दी के वरिष्ठ लेखक रघुवीर सहाय स्त्री के सच को निम्न पंक्तियों के द्वारा समझते हैं-

"कई कोठरियाँ थी क़तार में
उनमें किसी में एक औरत ले जाई गई
थोड़ी देर बाद उसका रोना सुनाई दिया।
उसी रोने से हमें जाननी थी एक पूरी कथा
उसके बचपन से जवानी तक की कथा"

स्त्री के इस बुनियादी स्वरूप को भारत में कम ही स्वर मिले हैं। हिन्दी लेखिकाओं में महादेवी वर्मा, पद्मा सचदेव, इन्दिरा गोस्वामी, बेवी हालदार, कृष्णा सोबती, अमृता प्रीतम आदि कुछ ऐसे नाम हैं जो स्त्री के मन की सरहदें नापने की कोशिश करती हैं। स्त्री के मन की गाँठें खोलकर उसके उमंगों, सपनों को रोशनी दिखाने का कार्य इन लेखिकाओं ने किया है। यह स्त्री विमर्ष का ऐसा पक्ष है जो किसी फ़ार्मूले पर नहीं चलता।

अपने शुरूआती विकास में स्त्री लेखन एक निश्‍चित अर्थ, और संदर्भ में रूढ़ हो गया। उत्पीड़ित समाज की संवेदना का साथ देते-देते यह विमर्श "पुरुष विरोध" तक सीमित हो गया । यद्यपि आक्रोश ज़रूरी है किन्तु उसका एक निश्‍चित आधार भी ज़रूरी है। यही कारण था कि कुछ लेखिकाओं ने आगाह किया कि- "अंधाधुंध पुरुषों का विरोध मात्र स्त्री विमर्श नहीं है।" सीमोन द बोउवा ने कहा था- "औरत पैदा नहीं होती बनाई जाती है।"2 इस विचार को और ज़्यादा व्यापकता देते हुए डॉ. राम मनोहर लोहिया कुछ यूँ लिखते हैं- "जैसे ही बच्‍चे से लड़की होना शुरू होती है वैसे ही लोग उसे धीमे बोलना सिखाते हैं, अकड़ और फैल कर चलने से रोकते हैं, एक शब्दों में दुबकना सिखाते हैं। वे निस्तेज हो जाती है, चाहे निस्तेज सात्‍विक हो अथवा निस्तेज सामन्ती हो।"3 तो इस रूपांतरण में स्त्री कहीं ज़्यादा मददगार रही है। अतः ज़रूरत थी इस साझे समाज में औरत की साझेदारी बढ़ाने की। शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक सुदृढ़ता, सामाजिक चेतना, ये कुछ ऐसे तत्व थे जो सच्चे मायने में स्त्री मुक्ति की वकालत करते थे।

अमृता प्रीतम ऐसी ही सजग लेखिका है। अपनी विशिष्ट शैली में रवानी के साथ वे स्त्री के कोमल तंतुओं को छेड़ती है। उनकी कहानियाँ "जंगली बूटी", "बृहस्पतिवार का व्रत", "नीचे के कपड़े", "और नदी बहती रही" तथा "करमावाली" स्त्री के वास्तविक सच, उसकी आकांक्षा, सपनों की वकालत करती हैं। एक षड्यंत्र के तहत स्त्री को, शिक्षा से, प्यार से दूर रखा गया। जयशंकर प्रसाद अपने उपन्यास "कंकाल" में इस तथ्य को उजागर करते हुए लिखते हैं- "पुरुष नारी को उतनी शिक्षा देता है, जितनी उसके स्वार्थ में बाधक न हो।"4

चूँकि प्रेम और शिक्षा दोनों ही क्रांति का मार्ग प्रशस्त करती हैं, अतः बचपन से ही औरत के मन में इन दोनों चीज़ों के प्रति अंधविश्‍वास पैदा कर दिया गया है। "जंगली बूटी" कहानी की पात्र "अंगूरी" स्वयं ही इस बात की तस्दीक़ करती है-

"तुम पढ़ोगी?"
"मेरे को पढ़ना नहीं आता।"
"सीख लो"
"ना"
"क्यों"
"औरतों को पाप लगता है पढ़ने से"5

ये पंक्तियाँ उस षड्यंत्र की एक बानगी मात्र है जो स्त्री समाज के साथ इस व्यवस्था द्वारा किया जाता रहा है। यह अंधविश्‍वास उनके मन में भर दिया गया कि स्त्री को पढ़ने से पाप लगता है। यह भारतीय संस्कृति की सदियों से चली आ रही वर्चस्ववादी विचारधारा की उपज है। शिक्षा एवं ज्ञान के क्षेत्र में पुरुष ने अपना साम्राज्य बना रखा है जिसमें स्‍त्री के प्रवेश को बड़े यत्‍न से रोका गया है। परम्परा ने यह रूढ़ कर दिया कि स्त्री को शिक्षा की आवश्‍यकता नहीं है बल्कि उसका महत्वपूर्ण कार्य शादी करके पुरुष का घर सँभालने का है। वरिष्ठ हिन्दी लेखक रघुवीर सहाय इस दुर्भाग्य पर कविता के माध्यम से हस्तक्षेप करते हैं-

"पढ़िए गीता
बनिये सीता
फिर इन सबमें लगा पलीता
किसी मूर्ख की हो परिणीता
निज घरबार बसाइए
होय कुँटीली
आँखें गीली
लकड़ी सीली, तबियत ढीली
घर की सबसे बड़ी पतीली
भरकर भात पसाइए।"6

ये पंक्तियाँ पूरी व्यवस्था की बर्बरता को उजागर करती हैं। गीता, सीता तथा देवी कहकर कवि ने अत्याचार एवं शोषण की पूरी कहानी व्यक्‍त की है। इन मिथकों की ओट में नारी सदा उपभोग्य तथा तिरस्कृत रही है। सीता बनने की दुहाई हमारा समाज देता है। अगर रामचरितमानस से देखें तो स्त्रियों को सीता का आदर्श सिखाया जाता है किन्तु कितने पुरुषों को राम के अनुकरण की शिक्षा दी जाती है। आज सीता "लोक" का प्रतिनिधित्व करती है। समाज की ज़्यादातर स्त्रियाँ सीता का जीवन जीने को विवश हैं।

अमृता प्रीतम का स्त्री विमर्श पुरुषों को ही दोषी नहीं मानता बल्कि रीति-रिवाज़, परंपरा, व्यवस्था तथा संस्थाओं को दोषी मानता है। स्त्री के प्रति तिरस्कार में ये सम्मिलित रूप से सहभागी हैं। विवाह संस्था एक हृदयहीन व्यवस्था है। "जंगली बूटी" कहानी में विवाह संस्था में निहित अत्याचारों को उजागर करने का प्रयास किया गया है। अंगूरी का विवाह "दुहाजू" पति के साथ कर तय कर दिया जाता है। विवाह जैसे महत्वपूर्ण फ़ैसले में स्त्री की राय अनिवार्य नहीं समझी जाती है। वास्तविकता यह है कि लड़की एक भार ही समझी जाती है, जिसे उतारने की चिंता समाज को ज़्यादा रहती है। कहानी यह दर्शाती है कि "प्रभाती" को पहली पत्नी के मृत्यु का शोक न हो किन्तु यह मान लिया जाता है कि उसका अँगोछा आँसुओं से ही भीगा होगा। पुरुष का भीगा अँगोछा स्त्री के आँसुओं से भीगे बालों से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। इस विषय में कहानी का बयान है-

"किसी भी मर्द का यह अँगोछा भले ही अपनी पत्नी की मौत पर आँसुओं से नहीं भीगा होता है, पर इस साधारण सी गाँव की रस्म से किसी और लड़की का बाप उठकर जब यह अँगोछा निचोड़ देता है तो जैसे कह रहा होता है- "उस मरने वाले की जगह मैं तुम्हें अपनी बेटी देता हूँ।"7

यह एक विडम्बना है जिसमें पति एवं पत्नी के बीच उम्र के अन्तराल को भी ध्यान में नहीं रखा जाता है। अमृता प्रीतम की यह महत्वपूर्ण विशेषता है कि उनके पात्र अभिव्यक्ति देते हैं, लेखक नहीं। यद्यपि कहानी में लेखिका स्वयं मौजूद है किन्तु पात्र ही रूपक गढ़ता है इसलिए इनका लेखन कहीं भी अविश्‍वासी नहीं लगा है। विवाह संस्था का क्रूर अत्याचार ही था कि अंगूरी को प्रेम हो जाता है। शिक्षा की ही तरह प्रेम को भी अन्धविश्‍वास से जोड़कर उसकी रक्षा का प्रयास किया जाता रहा है। जन्म से ही स्त्री के साथ नत्थी कर दिया जाता है कि प्रेम "जंगली बूटी" खाने से होता है। अंगूरी को प्रेम होता है तो वह रो-रो कर दुहाई देती है कि उसने जंगली बूटी नहीं खाई है। यह पूरी कहानी परंपरा से विरोध की कहानी है। कहानी के अंत में अंगूरी द्वारा "पढ़ाई सीखन" का यही सार्थक वक्तव्य है कि वह इस सड़ी गली परंपरा का विरोध करती है। "अंगूरी पहले कितनी ही देर मेरी ओर देखती रही, फिर धीरे से कहने लगी, "बीबीजी", मुझे पढ़ना सिखा दो।"8

बाबा नागार्जुन ने लिखा है – "सड़ गई है आंत, लेकिन दिखाए जा रहे हैं दाँत" यह पूरी व्यवस्था भी इसी प्रकार अंदर से खोखली हो चुकी है। किन्तु अब स्थितियाँ बदल रही हैं; अब स्त्री अपनी आज़ादी को महसूस करने लगी है। वह अपने कोटर से बाहर निकल रही है। अब तक दुबकी रही स्त्री को वाणी अमृता प्रीतम की कहानियों में मिली है। उनकी कहानियों में उस स्त्री की बात होती है जो समाज के सबसे निचले तबके से है। उसी समाज के मुद्दे भी हैं तथा पात्र ही अपना बयान देते हैं। चाहे वह""बृहस्पतिवार का व्रत" में गीता हो, जंगली बूटी में "अंगूरी" हो या "करमावाली" हो।

बृहस्पतिवार का व्रत कहानी उस लड़की की कहानी है जो वेश्‍यावृत्ति जैसा कार्य करने को मजबूर है। यह कहानी एक कालगर्ल से लेखिका के परिचय और उसके अनुभवों पर आधारित है। श्रीवास्तव लड़की तथा चौधरी लड़के के प्रेम विवाह करने से उनके साथ श्रीवास्तव एवं चैधरी शब्द छूट जाते हैं। पति के बीमार हो जाने से उपजी भयावह विवशता तथा छल का परिणाम उसे वेश्‍या बनने पर मजबूर कर देता है। स्त्री का प्रेम किसी भी हालत में समाज में स्वीकार नहीं है। वर्ग चाहे उच्‍च हो या निम्न प्रेम को वह बड़ी घृणा से देखता है। गीता यद्यपि ग़रीब घर से है, किन्तु ग़रीबी में भी एक प्रकार की ऐंठन होती है, जो घर की लड़की का प्रेम करना कभी स्वीकार नहीं कर पाया। कहानी के हस्तक्षेप को समझें तो अमृता प्रीतम लिखती हैं-

"और जब मन्दिर में जाकर दोनों ने विवाह कर लिया था, तब चौधरी और श्रीवास्तव दोनों शब्द उनके साथ मन्दिर में नहीं गये थे। और मन्दिर से वापस लौटते क़दमों के लिए चौधरी-घर का अमीर दरवाज़ा ग़ुस्से के कारण बन्द हो गया था और श्रीवास्तव घर का ग़रीबी की मजबूरी के कारण।"9

अमीरी का ग़ुस्सा और ग़रीबी की मजबूरी ये शब्द मात्र परंपरा को जायज़ ठहराने के लिए है। घर से बेदख़ल, तथा पति की बीमारी तथा बच्चे के पालन की समस्या से ऊबकर स्त्री घर की राह नहीं पकड़ती बल्कि वह सब्ज़ी बेचने का कार्य करती है। इस कहानी का पात्र तथा "करमावाली" कहानी का पात्र दोनों ही अपने अस्तित्व को स्वीकार्य करने के लिए समाज से लड़ रहीं हैं। जहाँ गीता वेश्यावृत्ति10 अपनाने को मजबूर हो जाती है वही करमावली ढाबे पर काम11 करती है। इन स्त्रियों का हर हाल में प्रतिरोध और अस्तित्व की लड़ाई इस व्यवस्था को माक़ूल जवाब है। यह स्त्री के संस्कार ही हैं कि वह हर हाल में अपने परिवार को बचाने पर तुली हुई है। एक प्रकार की यातना ही है कि परिवार के पालन के लिए वह वेश्‍यावृत्ति के लिए मजबूर है। जो काम दिल का है, दिमाग़ का है वह अगर देह से करना पड़े तो एक प्रकार की यातना ही है। अपने बेटे से गीता इस यातना को ही बयान करती है-

"मन्नू, मैं तुम्हारे लिए फूल चुनने जंगल जाती हूँ। बहुत बड़ा जंगल है, बहुत भयानक, चीतों से भरा हुआ, भेड़ियों से भरा हुआ, साँपों से भरा हुआ ............"।12

यह स्त्री उत्पीड़न का दूसरा सच है। आदमियों के इस जंगल में स्त्री की देह को भेड़ियों एवं चीतों की माफ़िक रोज़ रौंदा जाता है। वास्तव में यह जंगल आदमियों का है, जानवरों का नहीं, किन्तु यह जानवरों से ज़्यादा ख़तरनाक हैं। यथार्थ और आकांक्षा के बीच के संघर्ष को कहानी निर्दयता से प्रस्तुत करती है। इतिहास साक्षी रहा है कि स्त्रियाँ पुरुष से निरंतर छली गई हैं। अनुसुइया, सीता, शकुन्तला, गंगा, वृंदा आदि कुछ नाम पुरुष छल की कहानी कहते हैं। आधुनिक समय भी इससे अछूता नहीं है। बहुत सी शकुंतला आज भी दुष्यन्त के इन्तज़ार में जीने को मजबूर हैं। शबनम13, करमावाली14 जैसी स्त्रियाँ आज इस छलावे की त्रासदी में जीने को मजबूर हैं। वही शैला (कान्ता) ऐसी दुर्भाग्य की शिकार महिला है जो अपने ही पति के द्वारा वेश्‍या बना दी गई। शबनम इस घटना को गीता से बताते हुए कहती हैं-

"ऐसे पति विवाह के मन्त्रों को भी धोखा दे देते हैं। उससे शादी करके उसे बम्बई ले गया था, यहाँ दिल्ली में उसे बहुत से लोग जानते होंगे, बम्बई में कोई नहीं जानता, इसलिए वहाँ वे नेक ज़िंदगी शुरू करेंगे............. अब सुना है कि वहाँ बम्बई में वह आदमी उस नेक ज़िन्दगी से बहुत पैसे कमाता है।"15

पति जो कि रक्षक की भूमिका में होता है, उसी के द्वारा ठगी गयी स्त्री त्रासदी की साक्षात गवाह है। पुरुष एक स्त्री के होते हुए कई स्त्रियों से संबंध रखता है किन्तु स्त्री के ऐसा करने पर वह "कुलटा", "चरित्रहीन" आदि बहुत सी उपाधियों से नवाज़ी जाती है। इसके बावजूद स्त्री उसका साथ नहीं छोड़ती। शबनम की ज़िन्दगी में दुष्यन्त नहीं आया किन्तु अपने इस पेशे को वह अपनी तपस्या मानती है। वह इसी "व्रत-नियम" के द्वारा उससे अगले जन्म में मिलने की आस लगाये है। वह पूजा से कहती है-

"जिस तरह दुष्यन्त की अँगूठी दिखाकर शकुन्तला ने उसे याद कराया था- उसी तरह शायद अगले जन्म में मैं इस व्रत-नियम की अँगूठी दिखाकर उसे याद करा दूँगी कि मैं शकुन्तला हूँ।"16

यह स्त्री का दुर्भाग्य ही रहा है कि वह पुरुष के छलावे का शिकार रही है। अगले जन्म में पुनः इसी पति को पाने की चाहत स्त्री की निश्छलता को दर्शाती है। यह निश्‍छलता भले ही "आत्मघाती" हो। किन्तु अब स्त्री प्रतिकार करना सीख गई है। आज की स्त्री किसी की उतरन पहनने को मजबूर नहीं है। पुरुष समाज आर्थिक निर्भरता के कारण औरत जाति का शोषण करता आया है। "करमावाली" कहानी की प्रमुख पात्र जब यह जानती है कि उसके पति का दूसरी औरत से सम्बन्ध है। तो वह नियति के भरोसे नहीं बैठती बल्कि वह "उतार" को अपनाने से इंकार कर देती है। स्त्री का यह इंकार बिना किसी शोर-शराबे अथवा हाहाकार से मुक्त होकर सही मायने में स्त्री मुक्ति की वकालत करता है। अमृता प्रीतम की कहानियों में कोलाहल कम है, विचार ज़्यादा सक्रिय है। लेखिका से बातें करते हुए करमावाली कहती है-

"बीबी, तू मेरे मन की बात समझ ले। मुझसे उतार नहीं पहना जाता- मेरी गोटा-किनारी वाली शलवारें, मेरी तारों जड़ी चुनरियाँ और मेरी सिलमों वाली कमीज़ें-सब उसका उतार (पहले पहने हुए कपड़े) थे। और मेरे कपड़ों की भाँति मेरा घरवाला भी।"17

उतार पहनने से इंकार वास्तव में उन तरीक़ों से प्रतिरोध है जो औरतों को मारने के लिए इस व्यवस्था से बना रखे हैं। ये तरीक़े परंपरा के नाम पर अलग-अलग समय में प्रयुक्त होते रहे हैं। कभी इसका शिकार सीता हुई थी तो आज "बृहस्पतिवार का व्रत" कहानी की पात्र पूजा है। वहाँ सीता बच्चों का पालन अकेले करने के लिए अभिशप्‍त थी तो यहाँ पूजा। बृहस्पतिवार का व्रत कहानी स्त्री विमर्श के विरोध की कहानी है। स्त्री विमर्श जहाँ देह मुक्ति को प्रस्थान बिन्दु मानता है, वहीं यह कहानी देह को ही अपने पक्ष में प्रयोग करती है। यद्यपि गुनाहों के छीटे उसे अपनी देह पर सहने पड़ते हैं किन्तु उसकी आत्मा, उसमें भरी पवित्रता बड़े यत्‍पूर्वक क्रान्ति की ओर अग्रसर है।

इस व्यवस्था में ऐसी अनेक कुप्रथाएँ भरी पड़ी हैं जो स्त्री के विरोध में रही हैं। ऐसी ही एक कुप्रथा "नियोग प्रथा" के नाम से जानी जाती है। "और नदी बहती रही" कहानी में अमृता प्रीतम नियोग प्रथा का वियोग करती है। प्राचीन काल में महर्षि वेदव्यास ने इस प्रथा का प्रश्रय लिया था तो आज बलदेव उसी प्रथा के सम्मुख हैं। इतिहास के एक सिरे से दूसरे सिरे में आकर यह प्रथा पुनः मुँह बाये खड़ी है। कहानी के प्रारम्भ में ही लेखिका लिखती हैं-

"एक घटना थी- जो नदी के पानी में बहती हुई किसी उस युग के किनारे के पास आकर खड़ी हो गई, जहाँ एक घने जंगल में वेदव्यास तप कर रहे थे"18

यह कहानी मिथक का सहारा लेकर लिखी गई है। नियोग प्रथा की सार्थकता पर यह कहानी "प्रश्‍न" खड़े करती है। यह प्रथा स्त्री का अपमान थी। जिस सम्बन्ध में स्त्री की सहमति न हो, वह जायज़ नहीं है। यह स्त्री के तन एवं मन पर होने वाली बर्बरता थी। संतान की प्राप्ति के लिए स्त्री को पर पुरुष के साथ संबंध बनाने को मजबूर करने वाली संस्था उसे प्यार करने का अधिकार नहीं देती थी। संतान की समस्या तो स्त्री के चुने हुए व्यक्ति से भी दूर हो सकती थी। किन्तु वह स्वीकार्य नहीं है। नियोग प्रथा एक शाप की भाँति है; जो स्त्री की अंतर्रात्मा को राख कर देता हैं।

ऐसे सम्बन्धों का उद्देश्य संतान सुख ही होता है अतः पुरुष चुनने का अधिकार स्त्री के पास होना चाहिये। "चुनने की आज़ादी" देकर स्त्री को लोकतांत्रिक ताक़त प्रदान की जा सकती है। "नीचे के कपड़े" कहानी का बयान कुछ उसी प्रकार का है। कहानी उन दुर्भाग्यपूर्ण सामाजिक हालात को व्यक्त करती है, जिसमें लोग प्रेम करने के लिए स्वतंत्र नहीं है। कहानी ऐसे ही संबंधों को मिथक के द्वारा प्रस्तुत करती है। कहानी के नैरटेर को पता चलता है कि उसका असली पिता उसके चाचा हैं। यह घटना उसे बुरी तरह झकझोर देती है; उसे आवरण में भी हर व्यक्ति नंगा नज़र आता है।

पूरी कहानी स्त्री की बेबसी को ज़ाहिर करती है। वह चाहकर भी अपने संबंधों का प्रकाशन नहीं कर सकती। इसका कारण स्‍त्रियों का हर हाल में सम्बन्धों को बचाये रखने कि ज़िद है। जिस प्रकार बंजारा जाति की स्त्रियाँ अपने घाघरे के नेफे के नीचे अपने प्रेमी का नाम छुपा लेती हैं उसी तरह हर स्त्री अपने प्रेम संबंधों को अपने दिल में ही घोटने पर मजबूर है। बाँझपन एक अभिशाप है किन्तु नियोग प्रथा इस अहसास से कहीं ज़्यादा कष्टदायी है। इस समूचे दर्द की शिनाख़्त करते हुए सारा शगुफ़्ता लिखती हैं-

"वह रोज़ अपनी बन्द मुट्ठी में सिसक के रह जाती है
वह अपने बदन से रोज़ खिलौने बनाती है
और खिलौने से ज़्यादा टूट जाती है।"

किन्तु अब स्त्री ने अपनी बन्द मुट्ठी खोल दी है। अमृता प्रीतम का लेखन इस ओर इशारा करता है। सच्चे अर्थों में उनकी कहानियाँ एक स्त्री के तौर पर नहीं बल्कि एक "मनुष्" के तौर पर लिखी कहानियाँ हैं। यही कारण है कि इन कहानियों में कहीं बौद्धिक व्यायाम नहीं है, और न ही किसी प्रकार की नारेबाज़ी। उनकी कहानियों का परिवेश, समय, उसका प्लाट इस प्रकार है कि वह किसी भी स्त्री की कहानी है। यद्यपि उनकी कहानियों के ज़्यादातर पात्र समाज के निचले तबक़ों से आते हैं किन्तु ये पात्र कहीं भी सहानुभूति का शिकार नहीं रहे हैं।

उनकी स्त्री अपने अस्तित्व की लड़ाई ख़ुद लड़ रही है। विमर्श कहीं भी खाँचे में गढ़कर नहीं पैदा हुआ है बल्कि कहानी के विकास के साथ-साथ विमर्श ज़्यादा स्पष्ट होकर सामने आता है। यह कहानी लेखकीय सावधानी की ओर भी ध्यानाकर्षण करवाती है। लेखिका ने अपने को कहानी का तीसरा पात्र कहा है। उन्होंने लिखा है- "वह अपने पात्र का मन अपनी छाती में डाल लेता है और अपने पात्र के आँसू अपनी आँखों में"19। इसीलिए अमृता प्रीतम "मनुष्यता के चश्‍में" से कहानियों को देख पाई हैं।

समाज की बहिष्कृत, बदनाम और गुमराह औरतें इनकी कहानियों के पात्र रहे हैं। औरत के नज़रिये से प्रेम, विवाह, संस्थाओं को परखने का प्रयास कहानियों में हुआ है। शोषण के जितने भी औज़ार हमारी संस्था ने विकसित किये हैं, उनको एक-एक कर कहानियाँ खोज रही हैं और स्त्री सुलभ प्रतिरोध दर्ज करवा रही हैं। जहाँ लेखिकाओं का एक वर्ग अंधाधुंध देह की बातें लिख रहा था और इसे ही स्त्री विमर्श मान बैठा था। इस शोरगुल से दूर अमृता प्रीतम का लेखन स्त्री विमर्श को दिल और दिमाग़ के साहचर्य के साथ प्रस्तुत करता है। वह रूढ़ियों, परम्पराओं को कटघरे में खड़ा करती है तथा स्त्री के संदर्भ में उसकी जटिलता को यत्नपूर्वक सामने लाती हैं। उनकी कहानी के पात्र मजबूर अवश्‍य हैं किन्तु वे कहीं भी आत्मसमर्पण नहीं करते बल्कि उनकी ऐंठन बरक़रार रही है। उत्कर्ष एवं प्रगति में बाधक परंपरा से अमृता प्रीतम अपनी कहानियों में लगातार टकराती है। स्त्री की यातना, सामंती समाज के अभिशप्‍त जीवन तथा निर्वासन- बेदख़ली से संतृप्त युग में स्वयं को स्थापित एवं निर्वासित करती नारी इनकी कहानियों के केन्द्र में रही है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. आधी जमीन, सं. सरोज चौबे, अक्टूबर-दिसम्बर, 2001, पृ. 79
2. आदमी की निगाह में औरत, राजेन्द्र यादव, राजकमल प्रकाशन, सं. 2010, पृ. 15
3. भारतमाता धरतीमाता, सं. ओंकारशरद, लोकभारती प्रकाशन, सं. 2014, पृ. 83
4. वही, पृ. 16
5. मेरी प्रिय कहानियाँ, अमृता प्रीतम, राजपाल प्रकाशन, सं. 2014, पृ.15
6. रघुवीर सहाय मोनोग्राफ, पंकज चतुर्वेदी, साहित्य अकादेमी, प्रथम संस्करण, 2014, पृ. 62-63
7. दस प्रतिनिधि कहानियाँ, अमृता प्रीतम, किताबघर प्रकाशन, सं. 2011, पृ.30
8. वही, पृ. 34
9. वही, पृ. 12
10. शहर के कितने ही गेस्ट हाऊस, एक्सपोर्ट के कितने ही कारखाने, एअर लाइन्स के कितने ही दफ्तर और साधारण कितने ही कमरे थे, जिनमें उसके वर्तमान का एक-एक टुकड़ा पड़ा हुआ था। (बृहस्पतिवार का व्रत, 10)
11. यहाँ मामा-मामी के पास आ गई हूँ। उनका घर लीपती हूँ, मेज धोती हूँ। और मैंने एक मशीन भी रख छोड़ी है। चार कपड़े सी लेती हूँ, और रोटी खा लेती हूँ। भले ही खददर जुड़े चाहे लट्ठा। मैं किसी का उतार नहीं पहनती। (करमावाली, पृ. 32)
12 .वही, पृ. 10
13. मैंने नाम तो शबनम रख लिया है, परन्तु अन्दर से वही शकुन्तला हूँ- जो बचपन में किसी दुष्यन्त का सपना देखती थी....... अब ये समझ लिया है कि जैसे शकुन्तला की ज़िन्दगी में वह दिन भी आया था, जब दुष्यन्त उसे भूल गया था ......मेरा यह जन्म उसी दिन जैसा है। (बृहस्पतिवार का व्रत, 15)
14. फिर मुझे कोई बरस डेढ़-बरस-बाद पता चला, किसी ने बता दिया था। उसकी और मेरे घरवाले की लगी हुई थी। यह उसका दादा पोता के रिश्‍ते से भाई लगता था। (करमावाली, 31)
15. वही, पृ. 15
16 .वही, पृ. 16
17. मेरी प्रिय कहानियाँ, वही, पृ. 31
18. प्रतिनिधि कहानियाँ, वही, पृ. 60
19. मेरी प्रिय कहानियाँ, वही (प्)

अभिषेक कुमार गौड़
अशोध छात्र (हिन्दी विभाग)
डॉ. हरीसिंह गौर विश्‍वविद्यालय, सागर (म.प्र.)
मोबाईल- 09179613730
ईमेल-gaur.abhishek12@gmail.com


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें