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ISSN 2292-9754

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10.05.2017

आपके पत्र

अंक 122,  सितम्बर, प्रथम अंक, 2017


आदरणीय घई साहब,

भारत में हिन्दी के पाठक तो बहुत हैं, पर अधिकांश दैनिक समाचार पत्रों से आगे बढ़ ही नहीं पाते। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड जैसे राज्यों में हलवाई, बस-टैक्सी-ऑटो-रिक्शा चालक, दुकानदार वगैरह को हिन्दी अख़बार पढ़ते देखना आम बात है। इनमें से अधिकांश गंभीर हिन्दी साहित्य के पाठक नहीं हैं। बुद्धिजीवी वर्ग भी शायद ही सोशल मीडिया पोस्ट, तकनीकी मैनुअल और अंग्रेज़ी के बेस्टसेलर्स से अधिक कुछ पढ़ पाता है। और पढ़े भी क्यों? हिन्दी साहित्य की ओर आकर्षित होने की कोई वजह भी तो होनी चाहिए! पुराने समय में हिन्दी अख़बार पढ़नेवाले समय मिलने पर हिन्दी पत्रिकाओं पर भी नज़र दौड़ा लेते थे। शुद्ध साहित्यिक, धार्मिक, समसामयिक से ले कर अपराध, रोमांस आदि विविध रुचि के पाठकों के लिए साप्ताहिक-मासिक पत्रिकाएँ हर गली-नुक्कड़ पर मिल जाया करती थीं। इन्हें पढ़ने की आदत-सी हुआ करती थी। पर अब वैसी बात ही नहीं रही। लिहाजा, हिन्दी पाठकवर्ग शिक्षकों, साहित्यकारों और प्रवासी भारतीयों तक सिमटता जा रहा है।

- अमिताभ वर्मा
amitabh.varma@gmail.com

आदरणीय संपादक जी

नमस्कार। साहित्य-कुंज का मैं नियमित पाठक हूँ। इसमें हर विधा की रचनायें उच्च-स्तर की होती है। इस बार संपादकीय में आपने जो प्रश्न उठाया है वह विचारणीय है।

समीक्षा तैलंग,
अबु धाबी (यू.ए.ई.)


नमस्कार सर /मैडम

मेरा नाम नवनीत कौर है। मैंने पंजाब विश्व विद्यालय से प्रवासी हिंदी साहित्य पर ph.d की है. जिसमें आपकी पत्रिका में प्रकाशित लेखों से भी सहयोग लिया गया। मेरा शोध कार्य प्रकाशित होने वाला है और सभी के द्वारा सराहना भी हो रही है। आपकी पत्रिका के सहयोग के लिए मैं तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ.।

सादर -

- हरिहर झा
मेलबोर्न (आस्ट्रेलिया)

 

 

 

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