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ISSN 2292-9754

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05.26.2017

आपके पत्र

अंक 119,  जून, प्रथम अंक, 2017


आदरणीय घई जी,

सादर नमस्कार, संपादकीय पढ़ा। आपका बहुत अभिनंदन, आप और आपकी संस्था इस तरह के कार्यक्रम विदेशों में आयोजित कर रही है जहाँ कार्यक्रम के सफल होने में बहुत सी आशंकाये होती हैं। बावजूद इसके आप जैसे उच्च कोटि के साहित्यकार के रहते कार्यक्रम का सफलतम होना निश्चित ही है।

आप जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों का हिन्दी साहित्य को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक ही है। क्योंकि हिन्दी के प्रति लोगो की आसक्ति जहाँ कम हुई है वही लेखन के विषयों में भी भिन्नता नहीं है। लेखन की कितनी ही विधाओं के बावजूद अमूमन लोग कहानी अथवा कविताओं पर ही सिमट गए हैं। इसके लिए भारत की सरकार को भी राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लेखन के लिए भिन्न-भिन्न प्रतियोगिताओं को आयोजित कर लोगों को भारत की विभिन्न भाषाओं के प्रति आकर्षित करना होगा। भारत में साहित्य से जुड़े नामचीन लोगों को राजनीति करने से ही फ़ुर्सत नहीं है, उनसे इस प्रकार की उम्मीद रखना व्यर्थ ही है।

स्थिति कुछ गंभीर भी है। आजकल की नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा में ही बात करने से कतराती है वहीं दोस्तों यारों के बीच अँग्रेज़ी का ही चलन है। मेरा मानना है कि स्त्री ही है जो हर घर की नींव होती है, यदि वही ठान ले तो आगे की पीढ़ी को भाषा के प्रति आस्था और उसे सँजो कर रखने का बीड़ा उठा सकती है।

भवदीया,

समीक्षा तैलंग,
अबु धाबी (यू.ए.ई.)


नमस्कार सर /मैडम

मेरा नाम नवनीत कौर है। मैंने पंजाब विश्व विद्यालय से प्रवासी हिंदी साहित्य पर ph.d की है. जिसमें आपकी पत्रिका में प्रकाशित लेखों से भी सहयोग लिया गया। मेरा शोध कार्य प्रकाशित होने वाला है और सभी के द्वारा सराहना भी हो रही है। आपकी पत्रिका के सहयोग के लिए मैं तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ.।

डॉ. नवनीत कौर
navi.kaur45@gmail.com

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