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ISSN 2292-9754

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07.05.2017

आपके पत्र

अंक 120,  जुलाई, प्रथम अंक, 2017


आजकल की लड़कियाँ/लघुकथा/डॉ. शैलजा सक्सेना

डॉ. शैलजा सक्सेना की रचना आजकल की लड़कियाँ पढ़ी। रचना अच्छी लगी। पारिवारिक रूढ़ीवादिता को तोड़ती रचना अपने आप में सटीक है। उच्च शिक्षा प्राप्त नीता जब अपने गांव हाथरस से न्यूयार्क पहुंचती है। वहां पारिवारिक दकियानुसी बातों के लिए उसे उलाहना सुनना पड़ता है। काफी मशक्कत के बाद वह अपने को न्यूयार्क के माहौल में ढाल पाती है सीधा चलना और सीधा बैठना सीखती है। घर वापसी पर देखती है कि उसकी दादी तो पुराने विचारों को ही ढो रही है, जबकि उसकी मां उससे भी सीधा खड़ी है। पारिवारिक परिवेश में बदलाव के कारण उसके मन को सकुन मिलता है. अच्छी रचना के लिए लेखिका को बधाई!

-जनकदेव जनक
झरिया, धनबाद (झारखंड)।

सम्पादकीय: लघुकथा की त्रासदी-

आपका कथन सही है। घटना - लघुकथा नहीं होती, यह बात हम बहुत बार कह चुके हैं। लेखकीय अधीरता पागलपन तक पहुँच गई है। और भी बहुत सी बातें हैं। साँची कहूँ तो मारन ध्यावै ------वाली स्थिति है।

- आपका काम्बोज
(रामेश्वर काम्बोज "हिमांशु")
rdkamboj@gmail.com
http://laghukatha.com/

लघुकथाएँ फैशन के रूप में लिखी जा रही हैं

बहुत बहुत बधाई सर,
लघुकथा पर संपादक की चिंता उचित है। लघुकथाएं जिस तरह भावाभिव्यक्ति की बजाय फैशन के रूप में लिखी जा रही हैं निश्चित ही इसके उज्ज्वल भविष्य का परिचायक नहीं है। एक संपादक के रूप में ऐसे विषयों पर आप का ध्यान जाना हमें सोचने पर बाध्य करता है।
शुभकामनाओं सहित।

- कुमार ध्रुवम
dhruvbptripathi@gmail.com

आदरणीय घई साहब,

साहित्य कुंज के जून 2017 अंक का सम्पादकीय लघुकथा की त्रासदी बड़ा सटीक है। लघुकथा शब्द सुनते ही ग्रीक कथावाचक ईसप की कहानियों का स्मरण हो आता है। ये छोटी-छोटी कहानियाँ गागर में सागर समाहित किए हैं। यही कारण है कि इनका सन्देश चित्रों, मूर्तियों, कविताओं और नाटकों जैसी अन्य विधाओं द्वारा भी प्रचारित किया गया।

छात्र के सहज व्यवहार से शिक्षिका में उपजे अन्तर्द्वन्द्व पर डॉक्टर दीपा गुप्ता की कहानी कासे कहूँ मन तो मोहती ही है, सोचने पर मजबूर भी करती है। मज़े की बात यह है कि कहानी एक ऐसे मोड़ पर समाप्त हुई है, जहाँ से एक अन्तराल के बाद दोबारा प्रारम्भ हो सकती है। दामोदर सिंह राजपूत की कहानी ख़्वाहिशों की माया भी, कासे कहूँ के ही समान, एकपक्षीय प्रणय की कथा है। आशीष रंजन झा ने आकाश का रंग कहानी में बड़ी सुघड़ता से नवविवाहित जोड़े के दाम्पत्य जीवन का चित्रण किया है। मनोहर पुरी ने कितनी सार्थक होती हैं दूरदर्शन पर बहस आलेख में एक ज्वलंत मुद्दा उठाया है।

जून 2017 अंक में बहुत-कुछ है पढ़ने को। लेखकों तथा संपादक को बधाई!

भवदीय,
अमिताभ वर्मा
amitabh.varma@gmail.com

आदरणीय घई जी,

सादर प्रणाम, अभी-अभी अंक पढ़ा। हमेशा की तरह आज का संपादकीय कुछ नई सौगात लेकर आया है। सौगात ही है उन लोगों के लिए जिन्होंने प्रारम्भिक लेखन शुरू किया है अथवा जो वर्षों से लिखते आ रहे हैं पर उन्हें उनकी ग़लती बताने वाला कोई न मिला हो। वास्तव में स्थिति यही है कि लोग विचारों को लेकर कूपमंडूक दिख रहे हैं। विषयों में गंभीरता का अभाव प्रतीत होता है। बहुत ही सुलझे हुये शब्दों मे आपने अपनी बात रखी है तथा महत्वपूर्ण जानकारी आपने उन लिंक के द्वारा दी है। इसका लाभ मुझे भी मिल सकेगा। आप जैसे गुरुजनों के सानिध्य मे अपनी ग़लतियो को सुधारने तथा नया सीखने का अवसर प्राप्त हो रहा है जिसके लिए मै आभारी हूँ। बहुत धन्यवाद।

भवदीया,
समीक्षा तैलंग, अबु धाबी(यू.ए.ई.)

आदरणीय संपादक जी,

जून अंक में लघुकथा एवं मुक्तछंद कविता की दुर्दशा पर आपका संपादकीय पढ़ा। आजकल साहित्य की लगभग समस्त विधाओं के साथ यही हो रहा है। हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में गंभीर साहित्य सृजन की जड़ें कमज़ोर पड़ती सी दिख रही हैं। साहित्यकारों की बौद्धिक प्रतिभा सोशल मिडिया पर छिछली राजनीतिक मुद्दों एवं गुटबाज़ी के व्यर्थ बहसों में पड़कर नष्ट हो रही है। देश की सृजनात्मक शक्तियाँ फेसबुक व्हाट्सअप,पर नित्य नये ज्ञानकचड़े, सुबह शाम के नमस्कार, दिन शुभ होने की शुभकामनाएँ, राजनेताओं के बेतुके एवं थोथे आत्म प्रचार, विरोधी समर्थकों की आपसी गाली-गलौज जैसे संदेशों की भरमार से त्रस्त हैं।

प्रायोजित सोशल मिडिया की इस भीड़ में साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ यहाँ तक कि समाचार पत्र पत्रिकाएँ भी मार खा रही हैं तथा इनके लेखक पाठकों की गंभीरता समाप्त हो रही है। भारतीय हवाई अड्डों पर पुस्तक की दुकानों में चले जाईए हिन्दी की ग़लती से कोई अनुवादित किताब मिल जाय तो मिल जाय वरना समूची दुकान अंग्रेज़ी किताबों से भरी पड़ी होती है। ऐसे में साहित्यिक विधाओं का ह्रास निश्चित रूप से ही चिंता का विषय है। अपने संपादकीय में आपने समस्याओं को सामने रखकर उसके समाधान के सूत्र भी दिये हैं। मुझे लगता है कि संपादकीय में यह एक नया प्रयोग है। भविष्य में इस तरह के संपादकीय आलेखों की यदि परम्परा बनी तो निश्चित रुप से ही साहित्यिक विधाओं में सुधार एवं साहित्यकारों को मार्गदर्शन के साथ-साथ प्रोत्साहन मिलेगा।

सादर
राजनन्दन
rajnandanan@yahoo.co.in

 

 



 


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